सारी संवेदनाओं को तिलांजलि दे
जब कविता काठ हो जाती है ,
तब भी बेहतर होती है वह
उन तमाम बेतरतीब खूंटों से
जो शब्द उगा पाने में नाकामयाब होकर
बस ,यूँ ही उठ खड़े होते हैं जहाँ तहां
चाह और आह की जुगाली करने --
यकीन मानो
कविता का मुस्कराना
कभी कभी उतना मायने नहीं रखता
जितना सन्नाटों को चुप्पा देने वाली
उसकी आखिरी सांसों का चढ़ना उतरना -
जिसमें घुली हुई धुंए और राख की गंध
अब भी इशारा करती है
कि सब कुछ तबाह होने और ना होने के बीच
सिर्फ तुम्हारे क़दमों का यूँ बेआवाज़
निशां छोड़ देना
उसे उसकी मंजिल की राहों का
एक नया पता देना भर है.....!
