Monday, 27 May 2013

दहलीज के दायरे



छत के कोने से गुजरते पिछली रात
उस जगह पाँव पड़ गया मेरा
जहाँ खड़े हो कर
दहलीज के दायरे समझाए थे तुमने -
ना कभी दहलीज पार की,
ना दायरे से बाहर ही निकली मैं
फिर भला कैसे ऊँचाइयों में बसने का ख्वाब देखती ?
जानती हूँ ख्वाहिशों की तासीर
अक्सर नम होती है
और मंजिलों की रौशनी
भूमध्य रेखा के पार झिलमिलाती है
फिर भी तमाम उलाहनों की आंच
आँखों में उतारती  रही
क्या हुआ जो निगाहें झुलस कर धुँधला गई ?
प्रतिशोध की ज्वाला तो दूर
मुझ में तो सामान्य ताप भी
नहीं उभरा अब तक !
रही सही कसर
स्मृतियों के शीतल झोंके पूरी कर देते हैं
जिन्हें बियाबान रेगिस्तान के तपते कोने में
गज भर नीचे गाढ़ के मैं
निश्चिन्त हो गई थी .......
काश कि उन्हें गंगा किनारे तैरा दिया होता
अब तक समंदर में जा गिरे होते
इस तरह बार बार वापस तो न आते !!
या फिर ऐसा ही मैंने अपनी देह के साथ किया होता .....
.तो तुम्हारी मुस्कराहटें मेरी आत्मा
के चारो ओर बिखर कर
अब तक---
 कहकहों  में तब्दील हो गयी होती .....!

Thursday, 23 May 2013

स्वनिर्णय



एक एक शब्द से 
सौ नश्तरों की चुभन और 
तेजाब सी जलन का अहसास पाना 
हर स्त्री के नसीब में नहीं होता ---
देह के भीतर भी पत्थरों की कमी नहीं 
और बाहर  भी . 
हर चोट एक दूसरे से 
गुत्थम गुत्था हो कर शून्य हो जाती है 
ओर  क्या रह जाता है ....?
समर्पण की धज्जियाँ उडाता अट्टाहस  ......!
यह नियति नहीं -
कर्मरेखा या भाग्यफल भी नहीं ,
स्वनिर्णय होता है 
जो बार बार सिर्फ इस वज़ह से 
कमज़ोर पड़ता है कि 
अगली बार ऐसा नहीं होगा शायद ........! 
जंगलों में पेड़ अकेले नहीं होते 
परन्तु हर लता उनसे आकर लिपटती भी नहीं .
मैं गुलीवर के देश को नहीं जानती 
लेकिन घूरों पर उगते कुकुरमुत्ते 
अक्सर जंगलों में तब्दील नहीं होते 
और----
 उन बौने  जंगलों में
 तेजाब  से जले चेहरे वाली स्त्री 
अब नहीं उगती ......!!!

Thursday, 16 May 2013

पिछले दो बरस


पिछले दो बरसों में 
कितनी ही बारिशें हुयीं 
तमाम झीलें लबालब  भरीं 
लाल -पीले फूलों से वादियाँ महकीं 
पर -मैं न भीगी …
एक बार भी 
न मन भीगा न तन ....!
यूँ सब कुछ वैसा ही है 
हरा -भरा ,नम सा -
मिटटी पे एक गीला हाथ फिरा दिया हो जैसे 
कहीं कुछ सूख कर तड़का नहीं अब तक !
मुमकिन है
अगले दो बरस या उससे ज्यादा भी
ऐसा ही रहे ....
भीतर तक झाँकने की
जुर्रत नहीं की मैंने ....
क्या पता कहीं कोई सूखा ,पपडीदार
ज़ख्म रिस रहा हो
कुरेदे जाने के इंतजार में
नासूर बन जाने तक
खामोश ---
अलहदा ---!!!

बस…यूँ ही तो


यादों की तलहटी से परावर्तित होकर 
अब मेरी आवाज़ अक्सर 
मुझ तक ही वापस पहुँच जाती है ....
शायद तुम्हें पीछे मुड़ कर देखने की 
आदत नहीं रही 
और मैं .....
कभी तुमसे आगे निकल न पाई !

तुम अब भी 
मुलाकातों के मुलम्मे चढ़ी यादों में 
बसर करते हो
जबकि मेरे लिए
तमाम उम्र का इंतजार भी काफी नहीं
बस…यूँ ही तो
कविताओं की बस्तियां उजडती हैं ---

रिश्तों का सौंधा कच्चापन छोड़ कर
तुम्हें तब्दीलियों का पथरीलापन
रास आने लगा है -
फिर भी मुझ में बस रहे 'तुम' को मैंने
तल्खियों की धूप से बचा रखा है .....
तुम जानते हो ना
पाँवों के निशान हमेशा
पगडंडियों पर ही उभरते है
कोलतार की सड़कों पर नहीं ??

Wednesday, 1 May 2013

फिसलन भरे ये शब्द....


कुछ दिनों से 
शब्द घेरे हैं मुझे चारों और से 
कोलाहल सा मचाते ...!
.न तो उड़कर परे हटते हैं 
न ही रचते कोई प्रेम कविता ..
तमाम कोशिशें करने पर भी
बिगड़ जाती है बार बार
शब्दों की तासीर
और कडवाहट टपकने लगती है
अनकहे बयानों से ....
.झील के किनारे चिपटे
भूरे हरे शैवालों सी
फिसलन भरे ये शब्द
लड़खड़ाते हुए वही आवाज़ देते हैं
जो पर्वत पार के मंदिर के घंटों में
अब भी गूंजती है .....!!!