छत के कोने से गुजरते पिछली रात
उस जगह पाँव पड़ गया मेरा
जहाँ खड़े हो कर
दहलीज के दायरे समझाए थे तुमने -
ना कभी दहलीज पार की,
ना दायरे से बाहर ही निकली मैं
फिर भला कैसे ऊँचाइयों में बसने का ख्वाब देखती ?
जानती हूँ ख्वाहिशों की तासीर
अक्सर नम होती है
और मंजिलों की रौशनी
भूमध्य रेखा के पार झिलमिलाती है
फिर भी तमाम उलाहनों की आंच
आँखों में उतारती रही
क्या हुआ जो निगाहें झुलस कर धुँधला गई ?
प्रतिशोध की ज्वाला तो दूर
मुझ में तो सामान्य ताप भी
नहीं उभरा अब तक !
रही सही कसर
स्मृतियों के शीतल झोंके पूरी कर देते हैं
जिन्हें बियाबान रेगिस्तान के तपते कोने में
गज भर नीचे गाढ़ के मैं
निश्चिन्त हो गई थी .......
काश कि उन्हें गंगा किनारे तैरा दिया होता
अब तक समंदर में जा गिरे होते
इस तरह बार बार वापस तो न आते !!
या फिर ऐसा ही मैंने अपनी देह के साथ किया होता .....
.तो तुम्हारी मुस्कराहटें मेरी आत्मा
के चारो ओर बिखर कर
अब तक---
कहकहों में तब्दील हो गयी होती .....!




