Wednesday, 9 November 2016

सफेद ज़हर के सौदागरों के सीनों में
रेत के सोते बहते हैं
जो भरभरा कर नेस्तनाबूत कर देते हैं
कुछ बीवियों के जागते ख्वाब
और उन तमाम बच्चों के ढेर सारे ह्वाई किले
जिनकी उँगलियाँ सिर्फ आँखें पोंछने के ही काम आती हैं ...!
उन्हें सुनाई देती है
'खुराक 'के बदले मिले सिक्कों की खनक ,
जो उनके महलों की soundproof दीवारों के कानों को
झिंझोड़ कर जगा देती है .

उन्हें दिखाई देती है
'बटन'के दावेदारों की अधमुन्दी पलकें
जो मेंड्रेक्स और मेंथाकुलिन के फर्क को समझने में
नाकाम हो चुकी है ....!

वे महसूस करते हैं
सफेद काले धुँए में गलते ज़िस्मानी खोल
और 'उड़ते पंजाब'की राह उन्हें दूसरी दुनिया के
करीब पहुँचा देने की तलब ....!
सुनो ,
अबकी बार तुम्हारे कुछ देखने -सुनने -महसूसने से पहले
आवाज लगा लेना उन ज़िन्दा मुर्दों में से किसी एक को ,
और
झाँक लेना उसकी पीली सफेद आँखों के सूखे पानी में ...
तुम्हें बिना पूछे सवालों के जवाब जानने का ,
हुनर आ जायेगा  !!!
-नीलम

Wednesday, 26 October 2016

अब मैं शहरों की भाषा समझ लेती हूँ ... 
कुछ शहर देर रात गए
बतियाते रहते हैं मुझसे,
वो सब भी कह देते हैं
जो वहां के बाशिंदे कहना नहीं चाहते.....
गंगा किनारे बहती हवाओं ने
चेता दिया था पहले ही -
ज़्यादा उम्मीद न रखना ,यहाँ नाउम्मीदी
घाट किनारे सोती सीढ़ियों से लिपट कर ,
जागती रहती है।
नम रेत पर लिखे नाम तो यूँ ही बह जाते हैं
इस बार चेहरे भी बहा दिए
भीड़ के सैलाब में -
वे तमाम चेहरे- जिन्हें छू कर उदासी गुनगुनाने लगती थी
और कुछ वे भी,जिनकी आँखें
डूबते सूरज की आख़िरी किरण को ,
अगली सुबह गंगा में तैराने तक खुली रहती थीं।
अम्मा के दिल-सा,हर दम भरा-भरा शहर ,
प्रार्थनाओं में बसता
आचमनों में घुलता
सफ़ेद चंदन-सा महकता 
घर लौटते मछुआरे सा गमकता ,
छूटता ही नहीं
खाली होती बार बार की निगाहों से !
हाँ ,निगाहों का खाली रह जाना कभी भरता नहीं
पानी उलीची हुई नाव की तरह....!!! 

Sunday, 10 July 2016

समंदर के खुश्क होने के इंतजार में 
मेरी तमाम दुआओं का सैलाब 
पलकों पर ही थमा है ....
एक आहट होते ही तुम्हारे करीब आने की 
मोंती से बिखर जायेंगे किनारों पे .....!!!
आज मैंने तुम्हे लिखते हुए पढ़ा -
तुम्हारी आँखों की मासूमियत को 
शब्दों की दरकार नहीं ....
कोशिश करना कि
पलकें न झपकें मेरी मौजूदगी में 
वरना एक कविता
सफ़र अधूरा छोड़ देगी .....!
आज फिर वही उगते सूरज की चहलकदमी के साथ 
दौड़ -धूप भरा दिन ....
बार बार परे हटाती तुम्हारी यादों को 
शाम के आखिरी छोर तक धकेल दिया -
उलझ उलझ के फिसल पड़ते तमाम दर्द 
आज ऑंखें नम ही न कर पाए -
इर्द गिर्द उग आये दो -चार ख्वाबों के अधबुने जाले
दूर कहीं घसीट कर छिपा दिए -
एक दो मासूम हसरतों ने सर उठाया भी
तो कुछ गहरी सांसों से उन्हें तबाह कर दिया ....
उफ़!!इतना सब कुछ हुआ
पर ये मन .....!!!
ये मन स्त्री न हो पाया .....!!!
टूटना बार बार नहीं होता 
फिर उसे बिखरना कहते हैं .....
आज मेरे आंगन में भी
गुलाब बिखरे हैं .....!!!
ऐसे ही नहीं गुज़र जातीं शताब्दियाँ 
पत्तों की उम्र तलाशते ....
मिटटी के बोझ तले रहना 
इतना भी आसान नहीं .....!!!
स्वप्न अब दिखते कम ....
महसूस ज्यादा होते हैं ......!!!
ये जो तुम्हारी टुकड़े टुकड़े प्रीत है न ....
मन को बहुत डरा देती है !
क्या होगा जो एक भी टुकड़ा 
मुझ तक ना पहुंचा तो ?????
सूरज के ताप सा 
सुनहरा स्पर्श ....
धुंधला गयी तमाम सीली नम सी यादें ...
सचमुच मिडास हो तुम !!!

Saturday, 11 June 2016

ना जाने क्यूँ नहीं देख पाए 
इधर उधर दुबके तारों को तुम ,
किसी की याद का घेरा भी था चाँद के चारों ओर 
और तमाम बादलों ने एक छोटा सा शहर ही बसा लिया था वहां .....
गीत और ग़ज़लें ना सही 
छिटपुट शेर बार बार मुंह निकाल
किसी की दाद के इंतजार में
अपनी पलकें झपकाते रहे रात भर ....
फिर कैसे कहते हो तुम
कि चाँद रात भर अकेला था????
उसने कहा वो कांटाहै 
मेरे जीवन में धंसा हुआ 
आर पार ---
स्मृतियों के जंगल से 
सुख दुःख के फूल पत्ते बटोरे थे एक दिन,
तभी चुभा होगा शायद ....
ढूँढ लेती उसी पल
बैठ के साये में उम्मीदों के
लेकिन -
रेत की परछाई भी गुमशुदा होती है......
जब भी कोई कडवाहट 
मेरी उँगलियों के पोरों से बहकर 
तुम्हारे सिर की नसों को सहला देती है 
तुम मुस्करा देते हो.....
उफ़!कितनी मिठास है तुम्हारे जीवन में.......!!!!
धूप की गंध 
लापरवाही के खुरदरे रंग ओढ़े 
तमाम पगडन्डियों की नमी को चटकाते हुये 
मेरे चारों ओर बस गयी है...
ऐसे में खूबसूरती शब्द ही 
उपहास उड़ाता प्रतीत होता है.
तुमने अब तक धधकती धरा पर
पानी के बीज नहीं बोये ना ?
कोशिश करके देखना
सिर्फ धुआं निकलता है...
धूप ,धुआं और धुंध -
इनका ख़याल निकले
तो बारिशों की रंगोली सजाऊँ !!!

Saturday, 4 June 2016



क्यूँ हलकी सी खरोंच को कुरेद कर
यूँ ही छोड़ देते हो
और ज़ख्मों की गिनती
बेवज़ह बढ़ जाती है .?
अब छोड़ दो यूँ तल्खियों में जीना 
ज़रा याद करके बताना कि -
क्या अब भी बाकी है
मेरी हथेलियों में बसी साँसें
तुम्हारे कंधे पे ??
जहाँ दम तोड़ने से पहले
हाथ ज़रा सा टिक गया था .....
अच्छा किया जो एक नदी के
रेगिस्तान बनने तक ठहरे नहीं तुम -
ना जाने कैसे टांग पाती
तुम्हारी याद की एक-एक मछली को मैं
आसमान से लटकती
तमाम उम्मीदों के सहारे ....!
जानती हूँ-
मैं तुम्हारा बीता हुआ कल हूँ
जिस पर तकलीफों की बेरहम धूल डाल
तुम आगे बढ़ चुके हो
बिना ये जाने
कि संवेदनाओं की एक बूँद के
गिर जाने भर से
उग पड़ेंगे उस धूल में
अब सिर्फ ---
यादों के कैक्टस ....!
अपनी तमाम बेरहम बददुआएं 
एक काले डोरे में बांध 
लटका आयी थी तुम्हारी मुस्कराती 
तस्वीर के गले में -
ये सोचकर कि औरों की ख़ुशी में 
अब कैसे हंस पाते हो तुम....!
नज़र के डिठौने सी काली,
जलती सी निगाह उस पर डाल कर ही
काम पे लगती थी -बेनागा ...
सब लापरवाही से करती इसी धुन में
कि अब किसे क्या फर्क पड़ेगा ??
रातों को जागकर सोचे गए
कैक्टेस से तीखे उलहानों की
बन्दनवार लटकती रोज़ सुबह-
कि कैसे कोई खिलती कली सी मुस्कराहट
दबे पाँव भीतर घुस कर,
मेरी बंद पलकों पे हौले से
शरारत भरी दस्तक दे जाएगी....!
लेकिन-
मेरे तमाम पुख्ता इंतजामों को 
धता बताकर ,
फिर से भेज दी एक किरन ख़ुशी की
मेरी अँधेरी ख़ामोशी में तुमने .
खुद से किये वादों के ,
बड़े जतन से बनाये सारे बदशक्ल साए-
ना जाने कहाँ गुम हो गए???
अब सोचती हूँ 
नाउम्मीदी की सभी खिड़कियाँ खोल 
उड़ा दूँ नाराज़गी के परिंदे 
किसी और के आकाश में ....
और किरन किरन जोड़ उगा लूँ 
सैंकड़ों रंगों वाला एक नया सूरज -
तुम्हारी काले डोरे वाली तस्वीर के 
चारों ओर ........!!!

मेरे तमाम पुख्ता इंतजामों को 
तहजीब के दौर में 
कुछ अनकहा बिखरा सा रह गया 
तुम्हारे और मेरे बीच .....
अजनबियत की अधबनी दीवार के पार 
एक कदम तुम चले होते ,
इस तरह मीलों के फासले तो न बनते
यूँ ही .....

Friday, 3 June 2016

वेदना

आह निकली मन से मेरे 
चोट जब तन पर लगी ,
सुन सको तो सुन लो भाई 
त्रासदी इस शाख़ की ।

दे दिया सब कुछ हमारा 
बिन लिए बदले में कुछ ,
ठान लेते हम न देना 
सांस सबकी जाती रुक ।

क्यूँ नहीं दिखते तुम्हें 
आँसू हमारी आँख में ?
क्यूँ नहीं दिखता लहू 
बहता हमारी शाख़ में ?

गिर रही लाशें हमारी 
पर तुम पसीजे क्यूँ नहीं ,
हम नहीं तो तुम नहीं 
ये तुम समझते क्यूँ नहीं ??

Sunday, 1 May 2016

कुछ दिनों से 
शब्द घेरे हैं मुझे चारों और से 
कोलाहल सा मचाते ...!
.न तो उड़कर परे हटते हैं 
न ही रचते कोई प्रेम कविता ..
तमाम कोशिशें करने पर भी
बिगड़ जाती है बार बार
शब्दों की तासीर
और कडवाहट टपकने लगती है
अनकहे बयानों से ....
.झील के किनारे चिपटे
भूरे हरे शैवालों सी
फिसलन भरे ये शब्द
लड़खड़ाते हुए वही आवाज़ देते हैं
जो पर्वत पार के मंदिर के घंटों में
अब भी गूंजती है .....!!!

Tuesday, 22 March 2016

अमावस के सुबह होने तक
सरसराती फागुनी हवाएँ
 न जाने कितने आंचलों को
सर से सरका कर गुज़र गयीं
पर ,
गली के आखिरी छोर वाले घर की
वो चौड़ी चौखट वाली खिड़की
टस से मस ना हुई....
यादों की फसल सुनहली होकर
इस पूरनमासी तक पक जाएगी
कुछ खिलंदड़ किशोर
चटका के ले भी जायेंगे दो -चार डालियाँ
करने होलिका के हवाले ,
तब अलसुबह -
बूढी हथेलियाँ किवाड़ धकेल कर
टटोलेंगी
जनने का उपकार चुका रही
पीढ़ी के तलवों की छुअन -
 बचपन के आँगन की मिट्टी में !!!


Saturday, 19 March 2016

हरे रक्त की बौछारें
लौट गईं आसमान की ओर
वापस!!!
मुमकिन है
ढूँढ न पाईं हों
अडिग -अटल अरावली के
दो -चार गोल घुमावदार पत्थर
जो जा छिपे हों लुढक कर कहीं
किसी अँधेरी खदान में.
रक्त को तो अब रंगहीन होना ही है
बिलकुल पानी- सा !
बौछारों...... तुम बरसो!!!!
फर्क न करो
रक्त और पानी में ,
हरा हो या लाल
वाष्पित तो होगा नहीं वह -
सिर्फ बहेगा जीवन की शिराओं में ...
और सुनो --
खदानों में अब सूरज नहीं निकलते !!!!




.रंग


हरी वादियाँ ,सुनहरी रेत
नीला समन्दर ,पीले खेत
लाल है टेसू ,गुलाबी हैं गाल
गेरुआ-सा मन,सतरंगी है गात
सुनो......रंग बतियाते भी हैं !!

प्रेम प्रीत का रंग हो गहरा
राग द्वेष नहीं रहे सदा
मुस्कान बिखेरे आती हवा
फागुन महकाए जाता फिज़ा
सुनो...... रंग गुनगुनाते भी हैं !!

भाँग का सुरूर ,उपहारों की उमंग
फुहारें ख़ुशी की ,मस्ती के संग
बीते बरस की यादें अपार
ग़मों को भिगोए प्यार की बौछार 
सुनो.......रंग बहकाते भी हैं !!!  

Sunday, 13 March 2016

तेजाबी चेहरों को जिलाने से
अन्तर्मन के चिथडों में विभाजित होने तक
एक पूरा का पूरा
भ्रमित अध्याय लिख जाते हो तुम -
जलन ,सिर्फ तेजाब ही नहीं देता
चिथड़े ,बारूद के ढेर की ही उपज नहीं होते .......
लिखो !
पुनः लिखो यह अध्याय !
इस बार भ्रम सर्वथा परे रहें 
कविता के सत्य से......!!!

Saturday, 5 March 2016

एक दर्द ,एक अहसास,एक राह 
परिंदे यूँ ही साथ उड़ कर नहीं आते मीलों दूर
भरोसा बाँधता भी है....!
बंधन सभी उलझते नहीं
कुछ खुल कर ज़्यादा दुखद हो जाते हैं।
देखना, पिछली बार की तरह इस बार भी
सफ़ेद उम्मीदों पे सतरंगी ख़्वाब बिखरेंगे
और फागुन आ कर जाने का नाम न लेगा
चाहे रंग कितने ही फीके क्यूँ ना पड़ जाएँ ....
तमाम गाँठों को खोलकर
उछाल देना आसमान की ओर
कोई न कोई परिंदा दबा ही लेगा अपनी चोंच में
और-
सुदूर बँट जायेगा हमारा साँझा अहसास
गोधूली के रंगों  के रूप में
बग़ैर अपना उजलापन खोए........!!


Friday, 12 February 2016

सिर्फ एक शब्द भर गूंजता है
तमाम उदासियों से भरी
बिन बुहारी उजड़ी रातों से
इस रंगहीन सुबह तक.... !
तक़रीबन भुला चुके पतों से लौटे हुए
वो अधलिखे ख़त
उस जंग लगे संदूक की तलहटी में
बेआवाज़ बंद होना बेहतर समझते हैं
जिसके ताले की चाबियाँ भी अब अपनी खनक भूल चुकीं हैं ...
कितनी बार सुनूँ उस आसमानी फ़रिश्ते की
खोई हुई आवाज़ से खुद के नाम की पुकार ??
जो जमीं तक पहुँचने से पहले ही
हवा के रुख सा ,खुदबखुद बदल जाता है
और मैं खोजती रह जाती हूँ
उसमें तुम्हारे नाम का पहला अक्षर .... !
सुनूँ कैसे वो सब?
जो कहा ही नहीं गया
और जिसके मायने समझने से पहले ही
दुनिया भर के शब्दकोष रिक्त हो कर ,अपने होंठ भींचे
ख़ुदकुशी की शिलाओं तले दब गए !
सुकून सिर्फ आँखों में बसना नाकाफी होता है
जब ह्रदय में बहते लहू का सफ़र शिराओं से परे ,
शरीर के रोम कूपों तक भटक जाता है
और सांसों के थमने तक चुप्पी से गिरहबंदी कर लेता है ....
फिर भी -
कहना सुनना सहना
शब्द दर शब्द लिख पायेगा
तुमसे जुड़े अहसासों के होने  का अद्भुत इतिहास
जिसे बाँच कर आने वाले युग को समझ आएगा कि
मुक्ति एक शब्द भर नहीं है !!!!




Wednesday, 10 February 2016

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ना वो एक सुहानी शाम थी
ना समंदर का तूफानी किनारा
जेठ की तपती दोपहर  में
तुम्हारी आँखों की तपन से
झुलसती पिघलती मैं-
अब तक सिर्फ बहे जा रही हूँ .....

पीली कनेर सी मुस्कराहट
तुम्हारा हाथ थामते ही आग हो गयी थी
और धुआँ हो गए थे वो तीन शब्द
जो मेरी जुबां से तुम्हारे होठों तक
पहुंचे भी ना थे ...

याद है मेरा आँखें मूँद कर
खुद को तुम्हारे हवाले कर देना ?
ना जाने क्यूँ मेरा चेहरा
उगते सूरज सा हो गया था
और तुमने कहा था -
"देखो ,झील किनारे शाम उतर आयी है..."

जबसे तुमने मुझे कविता कहा
मैं बस कागज पर ही उतरती हूँ ।
तबसे अब  तक मेरा यूं ही बहते रहना
बेमकसद कभी नही रहा ...
इस बार देखना ...
झील में खारापन कितना बढ़ गया है !!!

- नीलम शर्मा

Monday, 8 February 2016

एक आवाज़ दो
कि खिल उठे शुष्क पीली पलकों की कोर
और गुनगुना मौसम
कालिख पुते अंधेरों के
अधर सहला के गा उठे।

एक नज़र डालो
कि सांसों में घुले नमक से फूँक दूँ
समन्दर की रगों में जान
और शैवाली लहरें फिसल कर
तलवों दबी रेत से इश्क़ कर बैठे।

एक दस्तक दो
कि पलट कर दहलीजों के सिरे खोल दूँ
और तुम्हारी ग़ज़ल पाँव में बाँध
तुम्हारे ही शहर का रास्ता पूछूँ।

या फिर-
कुछ न करो
और मुझे ही समझ लेने दो
कि बसंत आ रहा है
या बस अंत ...... !!!

Monday, 1 February 2016

बेहतर होता हम अपने ईश्वर से
मुँह खोल के माँग लेते
पत्थरों को सेंक कर चमड़ी दागने की कला -
या फिर ,गोल किनारे वाले चौराहों पे झुके हुए
बुत-तराशों की पीठ पर अपनी उँगलियाँ घुमा कर पूछते
कि क्या आज धुंध छाई रही सूरज पर ?
उम्र के आखिरी पड़ाव की बाट जोहती
मछुआरिन की ऑंखें अब भी तरल हैं
रौशनी की दिशाओं से बेख़बर
मछलियों के अक़्स घूमा करते है उनमें ...
यूँ देखा जाये तो वक़्त की चक्की में
अँधेरा उजाला नहीं पिसता
धूप -छाँव  के पाट भी नहीं होते वहाँ
सिर्फ धधकती साँसों के हुनर परखते
रिश्तों के तपाए जिस्म खड़े होते हैं
जिनके भीतर की आग में
मंद मंद ही सही
कुछ धूसर धुएँ-सा घुटता तो रहता है
लगातार ......!!!

Tuesday, 12 January 2016

साँसों को सींचते रहने की कोशिशें भला कब  तक ???
मन की नमी सूखती जा रही है....
पलकें खुली किताब सी फ़ड़फ़ड़ातीं हैं
यूँ भला दर्द कैसे दरख़्त बन जियेंगे ?
आस के बादल दूर कहीं तलवों के नीचे दबा रखे हैं तुमने
एक उम्र चुटकी बजाते ही काट डाली थी
अब ये गुनाहों सी चादरें ओढ़ा कर
सलवटों से अनजान बनने की सजा तो न दो ... !
उस दौर तक दोबारा जाने का हौसला कहाँ
जिसमें शहर भर की सोच
मिटटी के घड़े सी पकाई थी
ये कह कर कि अब यहाँ बस्तियां नहीं उजड़ेंगी।
सुनो ,
छोड़ कर देखो नसीहतों की पतंग फिर से -
एक एक कर इल्ज़ाम
पेंच दर पेंच उलझ
हवा की बोलती बंद  देंगे
और तमाम रिश्तों की गिरह कसमसा कर
टूट जाने के भरम में ,
एक रंग भरे आसमान की ज़िद पूरी करने में
कामयाब हो जाएगी !!!!


Monday, 11 January 2016

समंदर किनारे लोग 
फँसाते मछलियाँ 
घोंपते खंजर 
अक्सर पीठ पर -
कभी तो वे समझेंगे 
इस्तेमाल सिर्फ वस्तुएँ होतीं हैं 
इंसान नहीं ... !!!

Monday, 4 January 2016

सुनो,
अबकी बार प्रेम में पड़ने से पहले
उन तमाम शहरों की धूल छान लेना
जहाँ डूबते सूरज को अर्क देने की प्रथा
सुहागिनों के चेहरों पर सौ -सौ चाँद उगा देती है।

हो सके तो उस दिशा में कुछ मंत्र  भी फूँक  देना
जहाँ यज्ञ के धुएँ को बारिश की बूँदों ने नहला दिया था
और आसमान हैरान हो कर
नारंगी से धूसर हो गया था।

इस बार अच्छी तरह परख लेना
चौराहे पे खड़ी मूर्तियों के चेहरों को ,
यकीनन उनकी पलकें बिना झपके
तुम्हारे ख्वाबों में तुम्हीं को बुनती हैं
फिर भी तुम राह भटक जाते हो।

प्रेम में होने की तुम्हारी अनगिनत शर्तें
गौ ग्रास की तरह, गंगा घाट पर प्रतीक्षारत
कागों को परोस देना -
देखना ,उस शाम की आरती में
सिर्फ उपालम्भों के दिये ही प्रवाहित होंगे।

और सुनो ...
ये सब ना हो सके तो
अबकी बार प्रेम में पड़ने से पहले
पिछले तमाम दिनों को रात में बदल कर
चाँद तारों को ओढ़ा देना
देखना -
अंधेरों से रौशनी का फर्क भूल गयी तुम्हारी आँखों से
मेरे नाम के सिवा कुछ और नहीं बरसेगा ....!!!


Saturday, 2 January 2016

मोहलत

मोहलत ही नहीं मिली इस बरस
तुम से जुड़ कर ,अलग होने -
और फिर से एक होने की।
एक आम सी ज़िंदगी की ख़ास पहचान
धुंध की शक़्ल में सितारों सी चमक
और पगडंडियों को समेटते रास्तों का सीधापन-
भूलता नहीं वो सब कुछ
जो याद आने से पहले तुम से हो कर गुज़रा
ख़ुदा की दी हुई
अमानत की तरह सहेजा
और धुआँ हुए ख्वाबों की महक सा समेटा।
आज भी -
बरस के आख़िरी  दिन
कुछ पाया नहीं तो कुछ खोने जैसा भी
महसूस नहीं होता
तड़के हुए शीशे सी ज़िंदगी को
एक और बरस की मोहलत दो....
फ़िक्र करने से पहले तुम्हारी
ख़ुद को तोडना
सीखना है !!!