Sunday, 10 July 2016

समंदर के खुश्क होने के इंतजार में 
मेरी तमाम दुआओं का सैलाब 
पलकों पर ही थमा है ....
एक आहट होते ही तुम्हारे करीब आने की 
मोंती से बिखर जायेंगे किनारों पे .....!!!
आज मैंने तुम्हे लिखते हुए पढ़ा -
तुम्हारी आँखों की मासूमियत को 
शब्दों की दरकार नहीं ....
कोशिश करना कि
पलकें न झपकें मेरी मौजूदगी में 
वरना एक कविता
सफ़र अधूरा छोड़ देगी .....!
आज फिर वही उगते सूरज की चहलकदमी के साथ 
दौड़ -धूप भरा दिन ....
बार बार परे हटाती तुम्हारी यादों को 
शाम के आखिरी छोर तक धकेल दिया -
उलझ उलझ के फिसल पड़ते तमाम दर्द 
आज ऑंखें नम ही न कर पाए -
इर्द गिर्द उग आये दो -चार ख्वाबों के अधबुने जाले
दूर कहीं घसीट कर छिपा दिए -
एक दो मासूम हसरतों ने सर उठाया भी
तो कुछ गहरी सांसों से उन्हें तबाह कर दिया ....
उफ़!!इतना सब कुछ हुआ
पर ये मन .....!!!
ये मन स्त्री न हो पाया .....!!!
टूटना बार बार नहीं होता 
फिर उसे बिखरना कहते हैं .....
आज मेरे आंगन में भी
गुलाब बिखरे हैं .....!!!
ऐसे ही नहीं गुज़र जातीं शताब्दियाँ 
पत्तों की उम्र तलाशते ....
मिटटी के बोझ तले रहना 
इतना भी आसान नहीं .....!!!
स्वप्न अब दिखते कम ....
महसूस ज्यादा होते हैं ......!!!
ये जो तुम्हारी टुकड़े टुकड़े प्रीत है न ....
मन को बहुत डरा देती है !
क्या होगा जो एक भी टुकड़ा 
मुझ तक ना पहुंचा तो ?????
सूरज के ताप सा 
सुनहरा स्पर्श ....
धुंधला गयी तमाम सीली नम सी यादें ...
सचमुच मिडास हो तुम !!!