अब कविता मेरे अंतस की गहराई से नहीं निकलती
ना ही वह पहुँच पाती है किसी दूसरे के मर्म तक ....
कविता का यूँ बेमकसद होना
उस सड़क पर बेतहाशा दौड़ने जैसा है
जिसकी मंजिल की तलाश
तुम पर ख़त्म नहीं होती !
कविता अब हलकी फुलकी भी न रही
जो पंख लगा कर पहुँचती रही तुम तक
कागज़ पर उतरने से पहले ...
शब्द दर शब्द आग बनती जाती है
या फिर उभरती है
एक बर्फीली नदी की शक्ल में ....
जानते हो,
जब कविता रोती है
तो तमाम ख्वाहिशें सूख जाती हैं
और समन्दर पानी उधार मांगने लगता है
उस एक पल को जीने की वज़ह बना लेना
बहुत मुश्किल होता है
जब बर्फ पिघल कर झीलों में बहा करती थी ....
गुजरे हुए कल की तमाम कड़वाहटें
बिखरा दी हैं मैंने हवाओं में ....
शायद अब तो मौजूद हूँ मैं
तुम्हारी रगों के लहू में ???
