Saturday, 14 June 2014

ये शहर शिनाख़्त नहीं करता किसी की ---!
तमाम तर्ज़नियाँ थक जातीं हैं दिशा बताते बताते ,
धुंध बादल बनने से पहले ही छितरा जाती है ,
सड़कें सरकती सी पहुँचातीं हैं गंतव्य तक ,
और -
ख़ुश्क मिजाज़ लोग तलाशते हैं रिश्तों में नमी … !
सुनो -
बारिशें छोड़े जा रही हूँ तुम्हारे तमतमाते शहर में !!!
थामे रखना दो बूँदें अपनी पसीजती हथेली में
कलम के साथ साथ…
अगली बार भीगती भिगोती आऊँगी
सावन के हरेपन में सौंधी महक बिखेरने
तब खोल देना अपनी बंद मुठ्ठी
और बहा देना ये दो बूँदें
बरसती बौछारों की गोद  में !
चाहो तो चख लेना उन्हें
बहुत खारी-सी लगेंगी …
आखिर तुम्हारी कलम से निकला तमाम नमक
समंदर तक थोड़े ही पहुँचता है !!!!

Monday, 2 June 2014

सुनो 
मेरे जाने के बाद 
मेरी खामियों को कहकहे न बनने देना तुम ...
तहा कर रख देना उन्हें 
अपने शहर के उस कोने वाली इमारत के तले 
जिसे तुम मंदिर कहने से 
हमेशा कतराते हो ।
हो सकता है 
वक़्त गुज़रने पर तुम्हें लगने लगे 
कि उम्र भर खामोश रहने से बेहतर है 
उस जगह जा कर 
शाम ढले कुछ देर घंटियाँ बजा दी जाएँ ...
यकीन मानो 
लोगों के क़हक़हों से सुरीली लगने लगेंगी 
ये आवाज़ें तुम्हें ...
और एक दिन -
तुम खुद से किया वादा तोड़कर 
वहाँ सर झुका लोगे ..... ।
बस ,मेरे जाने के बाद इतना भर करना तुम !!!!