Sunday, 17 June 2012

पिता



जीवन के हर मुश्किल पल में 
जब भी हाथ बढाया 
तुम फ़ौरन चले आए...
पिता,तुम आसमान नहीं हो....!
     पाल पोस कर बड़ा किया ,
     उखाड़ा ,फिर रोप दिया 
     किसी और की बगिया में ...
     पिता,तुम बरगद तो नहीं हो....!
चट्टान की मानिंद सख्त 
पर उगने देते मखमली काई 
अपने इर्द गिर्द की नमी में ...
पिता,तुम धूप भी नहीं हो ....!
       महीने के आखिरी दिनों को छोड़ 
       तमाम व्यस्तताएं भुला 
       लोरी झूले से नाता रखा ...
       पिता, तुम सिर्फ रोटी नहीं हो....!
तुम्हारे कांपते हाथ ,अब भी मेरी उँगलियों में मौजूद हैं 
तुम्हारा लहू ,मेरे पूरे वजूद में साँस लेता है 
तुम्हारी ऑंखें ,मेरे पोर पोर से झांकती हैं 
तुम्हारी सख्ती ,मेरे बच्चों के दुलार में दखल देती है 
         पिता,तुम आसमान ,बरगद,धूप और रोटी नहीं -
हर औलाद के जीवन सफ़र की 
वह पगडण्डी हो -
जिस पर अंधाधुंध दौड़ कर भी 
सब पा जाते हैं अपनी मंजिल
 तुम्हारी  ढेर सारी दुआओं की रौशनी की बदौलत .....!

Saturday, 16 June 2012

एक सोच



एक सोच-
कि तुम्हारा सब कुछ मेरा है-
अब नहीं रही...
गुज़र गई वह एक देह की तरह 
मेरे जीवन की सीमाओं से परे ,
वक़्त की शाख से टूटते लम्हों की मानिंद 
संवेदनाओं के आँचल की 
फटी गांठ से टपकती
यहाँ -वहां ...
अब असंभव है उसे समेट कर 
फिर से बांध लेना...
     एक और सोच-
     कि किसी को चाहो तो जिंदगी उसके नाम कर दो -
     वह भी आज चल बसी ...
     शोर मचाती रेल सी चाहत 
     अचानक खामोश पदचाप की तरह 
     मेरे बगल के दरवाजे पर 
     दस्तक देती रही ...
     और मैं इंतजार करती रही 
     उसके मुड़ कर मेरे दरवाज़े तक आने का...
पर अब अपनी सोचों के देहावसान पर 
दुखी नहीं होउंगी मैं -
अपना सा लगने लगा है मुझे 
पीडाओं का चेहरा ...
और अच्छी लगती है अब 
चोटों की मरहम से दुश्मनी ...
सुकून मिलने लगा है मुझे
उस कविता को लिख कर 
जिसमें तुम्हारी मौजूदगी 
अब कहीं नहीं है.....

Tuesday, 12 June 2012



सुनो,गौर से सुनो 
उसके क़दमों की आहट
चूड़ियों की खनक 
और पायल की रुनझुन -
समझो, उसकी कनखियों के इशारे 
चुप चुप से संवादों  
और माथे की सलवटों के मायने -
अब भी लरजते हैं उसके आलता रचे पाँव 
याद करके तुम्हारी हथेलियों की छुअन
ज़मीन और उसके तलवों के दरमियाँ -
कभी छिपकर देखना 
उसकी मेहंदी के बूटों में 
कहीं होगा तुम्हारे ही नाम का पहला अक्षर-
यह भी दोहरा लेना 
कि आखिरी बार कब लाकर दिया था 
उसे फूलों का गजरा?
हो सकता है उसके तकिये में 
अब भी समाई हो मोगरे की महक...
तमाम छोटी बड़ी उलझनों के बीच 
कब तुमने इसरार किया था 
एक प्याला चाय साथ साथ पीने का?
मुमकिन है वो राह तक रही हो 
तुम्हारी फुर्सत के चंद लम्हों की ,
जो जाने अनजाने तुम उसे छोड़ 
कितनों के नाम कर आये.....
ज़रा फिर से पकड़ो दायरों के उस सिरे को 
जिनमें चक्कर लगा लगा कर 
तुम डगमगाते क़दमों की शुरुआत ही भूल गए...
आवाज़ देकर तो देखो आज फिर से -
न लौट आयें तमाम मुश्किलों के हल 
थाम कर उसकी उँगलियों की गिरफ्त ,
तो समझूंगी मेरी सोच को अब 
तुम्हारे सहारे की ज़रुरत है......

Monday, 11 June 2012

मैं तुम्हें कभी नहीं भूल सकती



आज फिर से उगी वही तमन्ना 
एक बूँद बनूँ और बरसूँ तुम्हारे शहर में ...
मिन्नतें करुँगी सूरज से 
इतना जलाये मुझे कि मैं बादल बन जाऊं ,
हवा से करुँगी गुज़ारिश 
कि सीधे ला पटके मुझे 
तुम्हारे शहर के आसमान में 
और बस -
मैं बरस पडूँ वहां ......
कोई फ़िक्र नहीं
 जो किसी नदी नाले में भटकती फिरूँ
हो सकता है पेड़ की फुनगी पे ही अटक जाऊं 
या फिर नुक्कड़ वाले नल से ही टपक पडूँ ....
चाहत ये नहीं कि तुम्हारे शहर की मिटटी में 
यूँ ही गुम हो जाना है मुझे ...!
ख्वाहिश तो यह जताने की है मेरी 
कि मैं तुम्हें कभी नहीं भूल सकती......!!!

Sunday, 10 June 2012


स्थिरता ज़रूरी है 
भावनाओं ,संबंधों और अपेक्षाओं में ...
उत्प्रेरक की तरह 
हलचल मचने आती हैं दुविधाएं 
संवेदनाओं के भंवर में 
संदेह के कंकर उछलकूद मचाते हैं -
हथेली के नम होने से फिसल  जाती है
आस्थाओं की लाठी और-
शिराओं में गहरे तक उतर जाते हैं 
छिछोरे उलाहने .
एड़ी छोटी का जोर लगा देते हैं 
दो टूक संवाद 
हलों को उलझाने में .....
           इन सबसे परे बसर करती है 
          एक नामुमकिन सी जिंदगी 
          बेसिर पैर के सवालों के जन्मने का 
          मकसद खोजती ,
          परत दर परत उधेड़ती 
          ज़वाबों की तिलमिलाती बखिया -
          और ना मिलने पर 
         अपनी फ़िक्र और चिंताओं का 
         सिर धुनती ....
मैं स्थिर रहूंगी 
तुम्हारी तमाम बेवज़ह सी वजहों के बीच 
अचल.अडिग ....दीवार सी ...
चाहे कठोरता के अनेकों कंटीले  कटघरे 
बनाने पड़ें मुझे अपने चारों ओर-
तुम्हारे बेशुमार बेमियादी तन्जों के खिलाफ.....!!!!