जीवन के हर मुश्किल पल में
जब भी हाथ बढाया
तुम फ़ौरन चले आए...
पिता,तुम आसमान नहीं हो....!
पाल पोस कर बड़ा किया ,
उखाड़ा ,फिर रोप दिया
किसी और की बगिया में ...
पिता,तुम बरगद तो नहीं हो....!
चट्टान की मानिंद सख्त
पर उगने देते मखमली काई
अपने इर्द गिर्द की नमी में ...
पिता,तुम धूप भी नहीं हो ....!
महीने के आखिरी दिनों को छोड़
तमाम व्यस्तताएं भुला
लोरी झूले से नाता रखा ...
पिता, तुम सिर्फ रोटी नहीं हो....!
तुम्हारे कांपते हाथ ,अब भी मेरी उँगलियों में मौजूद हैं
तुम्हारा लहू ,मेरे पूरे वजूद में साँस लेता है
तुम्हारी ऑंखें ,मेरे पोर पोर से झांकती हैं
तुम्हारी सख्ती ,मेरे बच्चों के दुलार में दखल देती है
पिता,तुम आसमान ,बरगद,धूप और रोटी नहीं -
हर औलाद के जीवन सफ़र की
वह पगडण्डी हो -
जिस पर अंधाधुंध दौड़ कर भी
सब पा जाते हैं अपनी मंजिल
तुम्हारी ढेर सारी दुआओं की रौशनी की बदौलत .....!



