Sunday, 10 June 2012


स्थिरता ज़रूरी है 
भावनाओं ,संबंधों और अपेक्षाओं में ...
उत्प्रेरक की तरह 
हलचल मचने आती हैं दुविधाएं 
संवेदनाओं के भंवर में 
संदेह के कंकर उछलकूद मचाते हैं -
हथेली के नम होने से फिसल  जाती है
आस्थाओं की लाठी और-
शिराओं में गहरे तक उतर जाते हैं 
छिछोरे उलाहने .
एड़ी छोटी का जोर लगा देते हैं 
दो टूक संवाद 
हलों को उलझाने में .....
           इन सबसे परे बसर करती है 
          एक नामुमकिन सी जिंदगी 
          बेसिर पैर के सवालों के जन्मने का 
          मकसद खोजती ,
          परत दर परत उधेड़ती 
          ज़वाबों की तिलमिलाती बखिया -
          और ना मिलने पर 
         अपनी फ़िक्र और चिंताओं का 
         सिर धुनती ....
मैं स्थिर रहूंगी 
तुम्हारी तमाम बेवज़ह सी वजहों के बीच 
अचल.अडिग ....दीवार सी ...
चाहे कठोरता के अनेकों कंटीले  कटघरे 
बनाने पड़ें मुझे अपने चारों ओर-
तुम्हारे बेशुमार बेमियादी तन्जों के खिलाफ.....!!!! 

1 comment:

  1. वाह!!! शब्दों के छोटे से संसार में कितना बड़ा तूफान खड़ा कर दिया आपने....समय के पर भले लग जायें.....लेकिन मैं तुम्हे नहीं भूल सकती.

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