Tuesday, 30 October 2012

पैबंद लगी जिंदगी .


टुकड़ों टुकड़ों में मिलती हैं खुशियाँ
और एक टुकड़े को दुसरे से जोड़ने में
लग जाते हैं
पीडाओं के अनगिनत धागे ....
नफरतों की तीखी सुई की चुभन से
छलक पड़ती हैं ऑंखें
और ज़ज्ब हो जाती है नमी
फिर से उन्ही टुकड़ों में ......
     आसान नहीं है
     एक भीगे टुकड़े को दूसरे  तक पहुँचाना ,
    एक कोना भी अटक  जाये
    तोहमतों के काँटों में
    तो देर नहीं लगती
    घावों की बखिया उधड़ने में --
    यूँ ही चलती हैं कोशिशें
    और-
    जीती रहती हूँ मैं
   एक सीली सी
   पैबंद लगी जिंदगी ......!
 
     

Sunday, 28 October 2012

अभिलाषा


जब भी दिए की लौ सी जलती हूँ मैं
एक ही दुआ करती हूँ कि
तुम आओ -
 चाहे तूफानी हवा बन कर
या फिर बारिश की बूँदें ,
चाहो तो सनसनाता दीर्घ श्वास ही .....
बुझा ही दोगे न मुझे ???
स्वीकार है मुझे यह
रंगीन आत्मघात -
क्यूंकि
इसी बहाने ही सही ...
कोई मुझे फिर जलाएगा
और तुम्हारा
मुझ तक ---
बार बार आना जाना
यूँ ही लगा रहेगा!!!!!

Wednesday, 24 October 2012


मैंने तुम्हें निष्काषित कर दिया है
अपने जीवन के उन तमाम पन्नों से
जहाँ इल्जामों की स्याही से लिख डाले थे तुमने
मेरे अजनबी होने के अहसास ......

अब भी वो अजनबियत घुली हुयी है
मेरी रूह, मेरी नसों में-
जो कभी कभी उभर आती  है
शब्दों और हरकतों में भी-

अच्छा है नफरतों से मुलाकात
यूँ अचानक हो जाये
जो कुछ अन पिघला बाकी है हमारे दरमियाँ
भरभरा कर एक सैलाब तो ले आयेगा
यकीन की बेहिसाब कोशिशों में!!!!

Thursday, 18 October 2012


तमाम ख्वाब तैरा आई आज
झील की निस्तब्ध सतह पर
देखें रात भर कितनी हलचल
मचाती हैं लहरें .....
जल जाने दो उन में से कुछ को
सूरज के ताप में
बाकी बचे हवा की गिरफ्त में
बिखर ही जायेंगे ....
तुम तक तो एक भी न पहुँचने दूँगी
चाहे मछलियाँ भी उछल-कूद मचाएं .
मेरे ख्वाब हैं ,मेरी तहरीर है
तुमने तो लौटा ही दिए ना !
........
चलो देखें क्या क्या लौटाओगे ?
झील के किनारे के झुरमुट तो
अब भी फुसफुसाते हैं मेरा नाम
हमेशा तुम्हारे ही नाम के साथ ...
और वो पीले फूल-!
जिनमें छिपी सुबह का  चेहरा
अब तक सुनहरा है
कांटे उगा ही नहीं पाते अपनी भुजाओं में
उस दिन के बाद से .....
बार बार पहाड़ी पर  फिसलती तुम्हारी नज़र
पग डंडियाँ बना गयी है वहां
जिनसे गुज़र कर
कविताओं के छंद मुक्त नहीं होना चाहते ..
..........
चलो लौटा दो हवा में घुले वो तमाम स्पर्श
जिनके ताप से अब भी नमी ,
धुआं बन जाती है ....
मैं देती हूँ तुम्हें अपने
 सारे शब्द ,नाम और तस्वीरें -
आखिर तुम्हें भी ज़रुरत पड़ेगी
उन स्मृतियों को झील की सतह पर
एक धुंध सा बिछा देने की
ताकि मेरे ख्वाबों में उलझ कर
कोई लहर तुम तक पहुंचा न दे
एक  कतरा भी
उन लौटायी हुई तोहमतों का .......!!!!