Saturday, 22 September 2012

केंद्र नहीं हो तुम...

   
अटपटे सवालों के अनमने जवाब 
और अटका देते हैं रोड़े 
जीवन की सामानांतर राहों के 
सीधेपन में ....
उतावलेपन की हदों को काटती
तमाम सही-गलत चापें
रिश्तों की मासूम गोलाइयों के 
अर्थ ही बदल देती हैं ...
और 
इतने कोनों  से चुभोये जाते हैं 
नुकीले नश्तर 
कि त्रिभुज के तीन कोणों का
अस्तित्व ही निरर्थक हो जाता है...
उलाहनों के सघन अभ्यारण्य में 
भटक जाते हैं खुद दिशा सूचक
और उत्तर दक्षिण का फर्क भूल 
यहाँ वहां तकने लगता है 
ध्रुव तारा...
धरती से आसमान तक 
चारों दिशाओं की खींचतान में उलझी 
ये आकारहीन जिंदगी 
कभी आयात तो कभी वर्ग बनने की 
जोड़ तोड़ से 
क्यों कर उबर नहीं पाती ?
ज़रूरी तो नहीं कि
हर बार किसी केंद्र की तलाश 
तुम ही पर ख़त्म हो???

Tuesday, 18 September 2012


हाँ .आज फिर अकुलाई सी है धरती
पहाड़ों के भेद ,सागर में बहाने को आतुर ....
धुंध की चादर से 
नदी का नीलापन ढकती,
तमाम पथरीली राहों का 
अनगढ़पन बुहारती ,
सूने समंदर को 
लहरों का ब्याज बाँटती,
चमकीले तारों को 
अँधेरे में सजाती,
रेत का लहरिया पहन
सुबह तक गुनगुनाती ...
फिर भी हाँ -
आज अकुलाई सी है धरती ....

Wednesday, 12 September 2012


ज़ख्मों का नासूर बन जाना 
मेरी उदासी की वज़ह कभी नहीं रहा 
ना ही मुस्कराहटों ने 
कभी शहर के मौसम बदले हैं ...
उदासी या मुस्कराहटों का बेअसर हो जाना 
उन्हें औपचारिक नहीं बनाता
बल्कि कोई इस तरह से
मेरे वजूद का एक हिस्सा बन जाता है...
जोड़ रही हूँ उन हिस्सों को अपनी हथेलियों में
तुम्हारा चेहरा बन जाने तक....

सुनी सुनी उन सब कहानियों को सुनो
जो बार बार ठहर कर तुम्हारा पता पूछती हैं 
और अचानक पेड़ की फुनगियों पे टंग जाती हैं 
परिंदों की उस चहचहाहट को भी सुनो 
जिसमें सारे जहाँ का संगीत समाया है
मगर शब्दों की रोशनियाँ अब भी गुमसुम हैं....

अब तुम लौट जाओ


हाँ ,अब तुम लौट जाओ...
मेरे कोई भी शब्द ,अंक और रेखाएं 
अब तुम्हें रोकने की कोशिश नहीं करेंगे 
मेरी हथेलियों में तुम्हारे नाम की कोई रेखा 
बनी ही नहीं ...
ना ही मेरे शब्दों को तुम्हारी धडकनों का 
संगीत ही मिला है...
मुझे बंद कमरों की कैद हमेशा से भाती है 
और तमाम सुबहों शामों से अपना नाम मिटा कर
उन्हें शहर से बाहर तक 
हाथ पकड़ कर छोड़ने की फ़िक्र मुझे होने लगी है.....!

सन्नाटे मुझे कभी डरावने नहीं लगे
और चुप्पियों से मेरा पुराना नाता रहा है.
हाँ,अब तुम लौट जाओ
इससे पहले कि
मायूसी में तब्दील होने लगी मेरी आवाज़ की सिहरन ,
तुम्हें इन्सान महसूस करने में नाकामयाब हो जाये
तुम लौट जाओ.....!!!

लेकिन मेरे लौटने पर 
ना कभी तुम्हारा वश था -ना रहेगा...
मेरे आंगन के गुलाब अब भी 
तुम्हारे सवालों के सही जवाब देते हैं
वो तमाम स्मृतियाँ पहले ही
मेरी उम्र के हर कोने में घर कर चुकी हैं
जिन्हें उखाड़ फैंकने की तुम्हारी हर कोशिश 
नाकाफी रही है .
मेरा लौटना तुम्हारी उम्मीदों से ज़रूर 
वादाखिलाफी करेगा 
क्यूंकि तुम्हें चोटों से जूझने का शौक है 
तो मेरी आँखों की नमी भी
 किसी गैर ज़रूरी मरहम को 
बेअसर करने का दम रखती है.....