अटपटे सवालों के अनमने जवाब
और अटका देते हैं रोड़े
जीवन की सामानांतर राहों के
सीधेपन में ....
उतावलेपन की हदों को काटती
तमाम सही-गलत चापें
रिश्तों की मासूम गोलाइयों के
अर्थ ही बदल देती हैं ...
और
इतने कोनों से चुभोये जाते हैं
नुकीले नश्तर
कि त्रिभुज के तीन कोणों का
अस्तित्व ही निरर्थक हो जाता है...
उलाहनों के सघन अभ्यारण्य में
भटक जाते हैं खुद दिशा सूचक
और उत्तर दक्षिण का फर्क भूल
यहाँ वहां तकने लगता है
ध्रुव तारा...
धरती से आसमान तक
चारों दिशाओं की खींचतान में उलझी
ये आकारहीन जिंदगी
कभी आयात तो कभी वर्ग बनने की
जोड़ तोड़ से
क्यों कर उबर नहीं पाती ?
ज़रूरी तो नहीं कि
हर बार किसी केंद्र की तलाश
तुम ही पर ख़त्म हो???




