अब मैं शहरों की भाषा समझ लेती हूँ ...
कुछ शहर देर रात गए
बतियाते रहते हैं मुझसे,
वो सब भी कह देते हैं
जो वहां के बाशिंदे कहना नहीं चाहते.....
गंगा किनारे बहती हवाओं ने
चेता दिया था पहले ही -
ज़्यादा उम्मीद न रखना ,यहाँ नाउम्मीदी
घाट किनारे सोती सीढ़ियों से लिपट कर ,
जागती रहती है।
नम रेत पर लिखे नाम तो यूँ ही बह जाते हैं
इस बार चेहरे भी बहा दिए
भीड़ के सैलाब में -
वे तमाम चेहरे- जिन्हें छू कर उदासी गुनगुनाने लगती थी
और कुछ वे भी,जिनकी आँखें
डूबते सूरज की आख़िरी किरण को ,
अगली सुबह गंगा में तैराने तक खुली रहती थीं।
अम्मा के दिल-सा,हर दम भरा-भरा शहर ,
प्रार्थनाओं में बसता
आचमनों में घुलता
सफ़ेद चंदन-सा महकता
घर लौटते मछुआरे सा गमकता ,
छूटता ही नहीं
खाली होती बार बार की निगाहों से !
हाँ ,निगाहों का खाली रह जाना कभी भरता नहीं
पानी उलीची हुई नाव की तरह....!!!
कुछ शहर देर रात गए
बतियाते रहते हैं मुझसे,
वो सब भी कह देते हैं
जो वहां के बाशिंदे कहना नहीं चाहते.....
गंगा किनारे बहती हवाओं ने
चेता दिया था पहले ही -
ज़्यादा उम्मीद न रखना ,यहाँ नाउम्मीदी
घाट किनारे सोती सीढ़ियों से लिपट कर ,
जागती रहती है।
नम रेत पर लिखे नाम तो यूँ ही बह जाते हैं
इस बार चेहरे भी बहा दिए
भीड़ के सैलाब में -
वे तमाम चेहरे- जिन्हें छू कर उदासी गुनगुनाने लगती थी
और कुछ वे भी,जिनकी आँखें
डूबते सूरज की आख़िरी किरण को ,
अगली सुबह गंगा में तैराने तक खुली रहती थीं।
अम्मा के दिल-सा,हर दम भरा-भरा शहर ,
प्रार्थनाओं में बसता
आचमनों में घुलता
सफ़ेद चंदन-सा महकता
घर लौटते मछुआरे सा गमकता ,
छूटता ही नहीं
खाली होती बार बार की निगाहों से !
हाँ ,निगाहों का खाली रह जाना कभी भरता नहीं
पानी उलीची हुई नाव की तरह....!!!