Tuesday, 8 January 2013

तुम्हारी हँसी


अभी अभी धुली ,गुनगुनी धूप सी 
तुम्हारी हँसी 
आकर पसरी है मेरे आंगन में -
रहेगी एक कोने भर में 
शाम तक .....
सुखा लेने दो मुझे कुछ नम कतरे ,
सीले हुए ख्वाब ,
भीगे फाहे से भारी पलकों की चिलमन 
और उँगलियों के गीले पोर !
वक़्त कम है बहुत 
सड़क के पार पेड़ों की टहनियां
ज़रा सा आसमान भेजती हैं रोज़
बाकी कर देती हैं
हवाओं , पंछियों के नाम .
सूनी गली के छोर पर भी
अटक जाती है एक टुकड़ा धूप
खींचतान सी करती झुरमुट से ....
कल रात से चांदनी भी
बरसना भूल गई है
सिमटी पड़ी है धूल से अटे बादलों के पीछे .
अब मंद हो चली तुम्हारी हंसी की गर्माहट
फिर से धुली ,गुनगुनी होने में
सूरज के ताप से ज्यादा
मेरी तड़प के ताप से सेंक लूँ तुम्हारी हँसी .......।

Saturday, 5 January 2013

वह शहर


हर जाने अनजाने शख्स की तलाश की मैंने 
मगर सिर्फ खुद को ही पाया वहां 
तमाम पगडंडियाँ भर चुकी थीं 
झाड़ियों से 
और मेरे पैरों के निशानों का 
भ्रम भी नहीं था कहीं भी -
मालूम है अन्तरिक्ष में बसने लगे हैं लोग 
और परियों से दोस्ताना भी है मेरा 
पर यूँ इस तरह गुमशुदा नहीं हुआ जाता! !
मुझे लगा था मैंने ही वह शहर छोड़ा है .....मगर ....
दरअसल 
वह शहर ही मुझे छोड़ गया कभी का .......!!!

गुजारिशें


तुम्हारे सपनों से लदी
मेरी पलकें
बोझिल हो चुकीं है अब
फिर भी पत्थरों से
कुछ नहीं कहा मैंने .
सुना है पत्थरों को चिनवाते हैं
मकानों में
और उन मकानों में रहने वालों का
कोई सपना बचता ही नहीं .....
खिड़की -दरवाजों के रंगों में
उलझे वे लोग
बाहर के आसमान का सिन्दूरी होता रंग
और बादलों की चाँद से लुका छिपी का
संगीत समझ ही नहीं पाते !!!
मैंने अब तक सारा संगीत भी
तुम्हें नहीं दिया है
बाकी बची तोहमतों के बदले
रेत के समंदर पर
अपने ख्वाब बिखेर दूँगी ,
तुमसे किये तमाम वादे भी पूरे
नहीं करुँगी मैं ....
अधूरी ख्वाहिशों से जनमती हैं गुजारिशें .
मुझे चाहिए वो सब
जो बाकी है ....!!!
तभी ये बोझिल पलकें
गुम हो पाएंगी
उस अँधेरे सूरज की रौशनी में
जिसमें अब कोई
सपने नहीं देखता ..........!!!