Sunday, 29 December 2013

अब मेरा दर्द तुम्हारा नहीं रहा .....
मुझे लगता था दर्द का रिश्ता प्रेम के बंधन से ज्यादा मज़बूत होता है .....???
अभी अभी धुली ,गुनगुनी धूप सी
तुम्हारी हँसी
आकर पसरी है मेरे आंगन में -
रहेगी एक कोने भर में
शाम तक .....
सुखा लेने दो मुझे कुछ नम कतरे ,
सीले हुए ख्वाब ,
भीगे फाहे से भारी पलकों की चिलमन
और उँगलियों के गीले पोर !
वक़्त कम है बहुत 
सड़क के पार पेड़ों की टहनियां
ज़रा सा आसमान भेजती हैं रोज़
बाकी कर देती हैं
हवाओं , पंछियों के नाम .
सूनी गली के छोर पर भी
अटक जाती है एक टुकड़ा धूप
खींचतान सी करती झुरमुट से ....
कल रात से चांदनी भी
बरसना भूल गई है
सिमटी पड़ी है धूल से अटे बादलों के पीछे .
अब मंद हो चली तुम्हारी हंसी की गर्माहट
फिर से धुली ,गुनगुनी होने में
सूरज के ताप से ज्यादा
मेरी तड़प के ताप से सेंक लूँ तुम्हारी हँसी .......।
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सुनो,
मुस्कराहट के बादल बिखेरो अब ....
सूरज कब से निर्जला बैठा है ????
मेरी नींदें तुम्हारे दर्द के गलियारे में 
अक्सर चक्कर लगा कर लौट आती हैं ...
बस यूँ ही बन गए हैं 
छत के कोने कोने पे अधूरे कंगूरे से ...
इन दिनों बारिशें मुझे नहीं भिगोतीं हैं 
वो झीनी सी मासूमियत काफी हुई एक पैरहन के लिए .....!!
प्रेम में संदेह से उपजी कड़वाहट को 
नींद की गैर मौजूदगी में बहे आंसुओं में 
उबाल कर देखो 
तुम्हें लगेगा कि प्रेम का आसवन 
हो ही नहीं सकता .....
या फिर ये कडवाहट 
दरअसल यादों के खुरदरे आंगन की 
गीली मिटटी में दबी निम्बोलियों की थी 
जिसे वक़्त रहते बुहारने से पहले ही 
आशंकाओं का तूफ़ान 
तमाम दरख्तों की जड़ें हिला गया था ....!
झील में नमक सी तुम्हारी आवाज़
अक्सर यादों की लहरों पे बहती
अतीत के किनारों से टकराती है
और सन्नाटे संगीत में बदल जाते हैं .....
इस बार मिलो तो
अपनी आवाज़ की पोटली 
मुझे दे जाना ...
कुछ गहरी नज़रें ,मासूम शरारतें
और बातों का पिटारा भी ...!
मुझे बूँद दो बूँद नहीं
बौछारें चाहिए तुम्हारी मुस्कराहटों की
ताकि उदासी के मौसम
अब पलट कर भी ना देखें मुझे ....!!!
आज फिर से उगी वही तमन्ना
एक बूँद बनूँ और बरसूँ तुम्हारे शहर में ...
मिन्नतें करुँगी सूरज से
इतना जलाये मुझे कि मैं बादल बन जाऊं ,
हवा से करुँगी गुज़ारिश
कि सीधे ला पटके मुझे 
तुम्हारे शहर के आसमान में
और बस -
मैं बरस पडूँ वहां ......
कोई फ़िक्र नहीं
जो किसी नदी नाले में भटकती फिरूँ
हो सकता है पेड़ की फुनगी पे ही अटक जाऊं
या फिर नुक्कड़ वाले नल से ही टपक पडूँ ....
चाहत ये नहीं कि तुम्हारे शहर की मिटटी में
यूँ ही गुम हो जाना है मुझे ...!
ख्वाहिश तो यह जताने की है मेरी
कि मैं तुम्हें कभी नहीं भूल सकती......!!!
समंदर के खुश्क होने के इंतजार में 
मेरी तमाम दुआओं का सैलाब 
पलकों पर ही थमा है ....
एक आहट होते ही तुम्हारे करीब आने की 
मोंती से बिखर जायेंगे किनारों पे .....!!!
जब भी तुम्हारी आवाज़ का सहारा लेकर 
ख्वाबों को पर दिए हैं मैंने 
कहीं कुछ टूट कर ,
बार बार जुड़ा है ...
त्वचा के छिद्रों से लगातार रिसते दर्द 
हवा की नमी में घुल मिल गए 
और प्रेम का आकार 
सावन के बादलों सा बढ़ता गया ....
कुछ घुटन भरी सांसें 
ताज़ा दम होकर 
छितरा गयी यहाँ वहाँ
और बनता गया धुंध का एक कारवाँ
तुम्हारे शहर तक ......!
यकीन मानो ,
प्रीत का सुलगना ,सिर्फ तपाता नहीं
ना ही घोलता है रोज़ कानों में
मीठे शब्दों का शहद ---
ना ही प्रेम एक खरोंच भर है
जो खीँच देता है लकीर
किसी की गर्दन के पीछे से
पीठ के आखिरी छोर तक .....
ये दर्द ,घुटन ,तपन और खरोंच--
मेरे शहर से तुम्हारे शहर तक
शामिल होने वाले
हर ख्वाब का
ताउम्र पीछा करते रहेंगे
और तमाम रास्ते मुड़ मुड़ कर
तुम्हारी आवाज़ के हुनर पे
हैरान होते रहेंगे ....!!!
उस एक सुबह को साथ लिए
झील अब भी वहीं ठहरी हुई है
तमाम बारिशें थक गई-
पानी बाहर उफनता ही नहीं ...
कुछ मुस्कराहटें लहरों के साथ
जब तब करवटें बदलतीं हैं 
और-
न जाने क्यूँ नींद के झोंके बार बार
मंदिर की घण्टियों से सकपका जाते हैं ...
उम्मीद के घरोंदे
रोज़ बना के उजाड़ देती हूँ ,
गुलाबी रंग अक्सर नीला हो जाया करता है
और माथे के चाँद सितारे
अब सुदूर आसमान के आँगन में टंग गए हैं ...
ज़रूरी नहीं कि इतिहास पत्थरों पर ही लिखे जाएँ
जलते हुये दियों की दास्तां
हथेलियों की कालिख से भी सुनी जा सकती है ।
फूलों को कांटे समझे जाने का वक़्त
अब आ ही चुका है
फिर भी ---
आसमान के साथ साथ
सप्तमेष ग्रह के तमाम मंत्र
42000 बार दोहरा लिए हैं
जबकि जानती हूँ
कि प्रेम का इश्तहार नहीं होता ......!!!
लगातार तेज़ बारिश ....मन फिर भी गुनगुना सा ....
आज नहीं तो कल... 
बूंदों का एक होना ,सैलाब तो लाएगा ही ...
चाहे झीलों में या आँखों में .....!!!
कभी कभी सब कुछ खत्म नहीं होता ...चाहो तो भी नहीं 
वो बचा हुआ यूं ही कहीं 
बिखरा सा ,सिमटा सा 
अचानक मेरे पास से तुम्हारे पास 
और तुम्हारे पास से मेरे पास 
आने जाने में ही 
बढ़ता चला जाता है .....लगातार....
और किस्से घटने की बजाय 
बेतहाशा दौड दौड़ के बनने सवरने लगते हैं 
फिर से .....!!!
सख्त होते होते
पत्थर से चट्टान हो जाना
अब तक इतना आसान लगता था
आज जाना कि खारे पानी से
दरारें पड़ जाती हैं उसमें ...

सख्त ,कठोर ,संगदिल कहने भर से
चट्टानें नहीं तड़कतीं
ना ही वो खिसक कर उलझतीं हैं
पगडंडियों में -
जब कभी मौका मिले तो
दो डग चढ़ कर उन पर, पूछना
कि क्यूँ नहीं मौसम के रंग बदलते उनके लिए ?
क्यूँ बरिशे भीतर तक भिगोती नहीं उन्हें ?
और क्यूँ उन्हें कंकरों की तरह
झील में उछाले जाने की हसरत नहीं होती ?

कभी ये भी होगा कि
फूल बरसेंगे उस चौराहे पर
जहां से हम -तुम
अपनी अपनी राहें मुड गए थे
बगैर एक दूसरे की तरफ देखे
क्यूंकि-
जब गले तक उग आती है नागफनी
तब एक आह की गुजारिश भी
तमाम रास्ते भुला देती है
मुझसे तुम तक पहुँचने के .......!!!
  1. क्यूँ सुने वह
    तुम्हारी हर उस गैर ज़रूरी बात को
    जिसकी आहट भर से
    कंपकपा उठती हैं उसकी उँगलियाँ
    बगैर कलम को ये बताए
    कि बाकी शब्दों का इंतज़ार 
    उसे उम्र भर करना होगा ?

    क्यूँ थामे रखेगी वह जीवन भर
    आसमान को अपने हाथों में
    जबकि तुम रोज़ बादलों की पैदावार को
    बिना उसे बताए
    न जाने किसकी उम्मीदों के खलिहान में
    छोड़ आते हो ?

    क्यूँ खुली रखे वह अपनी आँखें इस डर से
    कि तमाम अजन्मे स्वप्न
    इस बार भी उसकी पनीली कोरों की
    गहराई में समा कर
    अपनी पैदाइश की घड़ी को
    क़यामत तक पहुंचा कर ही दम लेंगे ?

    क्यूँ जवाब दे वह उन बेहिसाब सवालों का
    जिनके उग जाने भर से
    नागफनी के जंगलों की चुभन
    अपना सारा असर छोडकर
    हरसिंगार के सिरहाने
    निहत्थी बैठ जाती है ?

    सुनो -
    अब सिर्फ सुनेगी नही ---
    न ही वह हमेशा की तरह अपना हाल ही बताती रहेगी -
    अब वह महसूस करेगी
    उस मौलिक ,अप्रकाशित कविता को
    जिसके यूं ही लिख देने से ज्यादा ज़रूरी
    उसमें से तुम्हारी मौजूदगी का अहसास
    निकाल फेंकना है
    और यकीन मानो
    जिस दिन ऐसा कुछ हो गया
    तो उसका जीना नहीं -
    उसका मरना
    तमाम कोशिशों के बावजूद
    तुम्हारे चेहरे की मुस्कराहट
    कई जन्मों तक मिटा नहीं पाएगा ॰...!!!
बिखरा था कल सब कुछ यहाँ वहाँ ,आज समेटने की कोशिश की ....
तो आँख भर आयी ....याद है तुमने कहा था ...
जो समेटा मेरे वजूद को,
तो रेत की सिलवटों में... कतरा भर जगह न बचेगी ....
तुम्हारी आँखों की नमी को !!
सुनो नदियो
सारे सपने, हँसी,आँसू ,
प्रेम ,बेवफ़ाई और दर्द की तहरीरें
गिन गिन के बीन लो
और बहा लो अपने साथ -
फिर भी 
तुम्हारे बहते जाने की दिशा
समंदर की ओर ही रहेगी .....
अब खतम करो अपना ये भरत मिलाप
और चल पड़ो मिटाने अपना अस्तित्व
क्यूकि
गुम हुये रिश्तों को ही शिद्दत से
तलाशते हैं लोग
और समंदर में तुम्हारा घुल जाना ही
नई सोच के साथ देगा
तुम्हारे पुराने सपनों को
बादलों सा पुनर्जन्म ......!!!!
 —

Saturday, 28 December 2013

हर रोज़ सुबह ओस सी टपकती है तुम्हारी याद
सूरज के चढ़ते ही धुंध हो जाती
फिर रात के नम होने का इंतज़ार करती। …
सुनो ,
ओस का गिरना सिर्फ फूलों की मुस्कराहट ही नहीं उगाता
मुझे भी सूरज को देर तक सोये रहने का
वास्ता देना पड़ता है। …… 
यूँ इस तरह से अचानक
बिना मुड़ के देखे तुम्हारा जाना। … 
हम हथेलियों से अब तक
पगडंडियों को नापे चले जा रहे हैं। … 
एक उम्र गुज़ारी बगैर तुम्हारे
अब कुछ लम्हे खड़े हैं इंतज़ार में …
गुज़रो इधर से
तो नज़र भर देख लेना। 
हथेलियों के वाष्प बन जाने  तक
थामे रहना मुझे यूँ ही
जानती हूँ
धूप  से हो तुम।