अभी अभी धुली ,गुनगुनी धूप सी
तुम्हारी हँसी
आकर पसरी है मेरे आंगन में -
रहेगी एक कोने भर में
शाम तक .....
सुखा लेने दो मुझे कुछ नम कतरे ,
सीले हुए ख्वाब ,
भीगे फाहे से भारी पलकों की चिलमन
और उँगलियों के गीले पोर !
वक़्त कम है बहुत
सड़क के पार पेड़ों की टहनियां
ज़रा सा आसमान भेजती हैं रोज़
बाकी कर देती हैं
हवाओं , पंछियों के नाम .
सूनी गली के छोर पर भी
अटक जाती है एक टुकड़ा धूप
खींचतान सी करती झुरमुट से ....
कल रात से चांदनी भी
बरसना भूल गई है
सिमटी पड़ी है धूल से अटे बादलों के पीछे .
अब मंद हो चली तुम्हारी हंसी की गर्माहट
फिर से धुली ,गुनगुनी होने में
सूरज के ताप से ज्यादा
मेरी तड़प के ताप से सेंक लूँ तुम्हारी हँसी .......।
तुम्हारी हँसी
आकर पसरी है मेरे आंगन में -
रहेगी एक कोने भर में
शाम तक .....
सुखा लेने दो मुझे कुछ नम कतरे ,
सीले हुए ख्वाब ,
भीगे फाहे से भारी पलकों की चिलमन
और उँगलियों के गीले पोर !
वक़्त कम है बहुत
सड़क के पार पेड़ों की टहनियां
ज़रा सा आसमान भेजती हैं रोज़
बाकी कर देती हैं
हवाओं , पंछियों के नाम .
सूनी गली के छोर पर भी
अटक जाती है एक टुकड़ा धूप
खींचतान सी करती झुरमुट से ....
कल रात से चांदनी भी
बरसना भूल गई है
सिमटी पड़ी है धूल से अटे बादलों के पीछे .
अब मंद हो चली तुम्हारी हंसी की गर्माहट
फिर से धुली ,गुनगुनी होने में
सूरज के ताप से ज्यादा
मेरी तड़प के ताप से सेंक लूँ तुम्हारी हँसी .......।
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