Sunday, 31 July 2022

मन

 अकेला मन कितना भारी हो जाता है

तमाम बोझ मानो पलकों पे डाल के

बुझे हुए ख्वाबों से ज़ोर आजमाइश करता है..

और फिर नाकाम हो कर बरस पड़ता है

जलते तपते मरुस्थल सी देह पर

मन को सुलगता सा छोड़ कर ...!!


धूप

 ज़रा सी धूप छिटक दो 

तुम्हारे चेहरे के सूरज से,

रेत के धोरों पर ऐसा सुनहरा समंदर

देखा न होगा किसी ने .....!!!