उलझे रेशम सी संवेदनाओं से संवाद करता मन ...कभी कभी तितली बन उड़ जाना चाहता है!!!
अकेला मन कितना भारी हो जाता है
तमाम बोझ मानो पलकों पे डाल के
बुझे हुए ख्वाबों से ज़ोर आजमाइश करता है..
और फिर नाकाम हो कर बरस पड़ता है
जलते तपते मरुस्थल सी देह पर
मन को सुलगता सा छोड़ कर ...!!
ज़रा सी धूप छिटक दो
तुम्हारे चेहरे के सूरज से,
रेत के धोरों पर ऐसा सुनहरा समंदर
देखा न होगा किसी ने .....!!!