Tuesday, 20 November 2012

दो घूँट चाय


कुछ लोग बताते हैं भविष्य
चाय के कप के तले में बनी
सूखी,पुरानी आकृतियों को देख कर ...
बनाते हैं खूबसूरत कल की
चमकीली ,रंगीन,मनमोहक तस्वीरें ....
गढ़ते हैं उपाय
आने वाली तमाम मुसीबतों से
पिंड छुड़ाने के
और झटक लेते हैं
हमारी आज  की मेहनत का
एक बड़ा हिस्सा .......!!!

मुझे भी दरकार है एक ऐसे ही किस्सागोई की
जो उधेड़ कर भविष्य के गर्त में दबी
तमाम उलझनों के फंदे -
सीधा सरल सा बुन दे
मेरे जीवन पथ का गलीचा ,
बेशक खुरदरा ही सही ---
बदले में माँग ले मुझसे
अपनी हसरत भर चाँद सितारे
और टंगा दे उन्हें किसी और के
चाय के कप की तलहटी में उभरे
अधबने आकारों पर ---
और वापस दे दे मुझे
मेरी दो घूँट  चाय सी ज़िन्दगी .....!!!!

Thursday, 15 November 2012


जब सन्नाटों की चीखें गूंगी हो जाएँ
और खामोशियों की खेती करने का ख्याल सर उठाये ,
तब तक सहेजी हुई स्मृतियों का गीलापन
बार बार कडवे अहसासों को भिगोकर
अंकुरित कर देता है ...
और तमाम ख्यालों के हकीकत बनने तक
मौन की फसल लहलहा उठती है---!
       
उस आग के बारे में मत सोचो
न ही उस राख की बातें करो
जो कविता की तपिश को बाहर लाने की बजाय
भीतर ही भीतर सुलगता छोड़ देती है
और चंद फुहारों के इंतजार में
वह खुद को अर्थहीन बना देती है .....!
ऐसी बेमकसद कविताओं के गूंगेपन पर
कोई शर्मिंदा नहीं होता -
न ही किसी कविता को
एक खूबसूरत ग़ज़ल में तब्दील करने के लिए
अक्षरों को सहलाना, मनाना ज़रूरी होता है !

मैं जानती हूँ
उन ढेर सारे  रंगों से मेरा अब कोई वास्ता नहीं
जिनके लिए हमेशा मेरी बिंदिया मुस्कराती थी ....
रंगों का खुद में सिमट कर
एक पीला मटमैला सा असर डालना
मेरी तबियत को अब
ज्यादा हरा कर देता है .......!!!!

दिवाली


मन के आकाश पर घिरते
अवसाद के अंधेरों में
तुम्हारी स्मृति अक्सर
पूनम के चाँद सी
दबे पाँव ,बेआवाज़ आती है .....
और फिर सचमुच-
बेमौसम ,पूनम मावस का अंतर छोड़
मेरी रग -रग
दिवाली हो जाती है ........!!!!