Monday, 25 March 2013

फूल यूँ ही आग नहीं उगलते

फूल यूँ ही आग नहीं उगलते 
ज़रूर चांदनी से इलज़ाम बरसे होंगे रात भर ....
धुआं धुआं प्रीत ने 
तमाम गिरहें खोल ,
बिछा दी है शब्दों की चादर 
जिद है तो तहा कर रख दो -
कविता फिर उम्र भर न बिखरेगी ...!
यकीन मानो -
जब सिलसिले शुरू होते हैं 
तो सहूलियतें किनारा कर लेती हैं 
अक्सर दो चार काँटों से
बाड बनाने की कोशिशें
नाकामयाब होती हैं
यूँ न हो कि कुछ देर सुस्ताने भर से
मंजिलों का नामोनिशान ओझल हो जाये ...
वक़्त का तकाजा है
कविता को उगना है
फूलों को महकना है
चाँद बार बार अश्क ना बरसाये
पत्थरों की अफवाहों पे धूल पड़ जाये
तमाम खुशबुएँ सिलसिलेवार बिखर जाएँ .....
तब भी फूल आगउगलना न छोड़ें
तो -
हथेलियों के कटोरे बना
मेरी आँखों के पानी से
मुस्कराहट छिड़क देना .वहाँ ..........!!

Wednesday, 13 March 2013

चलो एक बार....


चलो एक बार फिर वहीँ लौट जाएँ 
जहाँ से रोज़ एक मुस्कराहट को 
दफ़न करने के सिलसिले शुरू हुए थे 
यूँ न हो कि तमाम उदासियाँ 
एक अधूरी नज़्म के ख्याल भर से 
खिल उठें .....
चलो लौट जाएँ उस अनकही कहानी की गोद में 
जिसके तमाम शब्द
 तितर बितर होने से पहले 
मेरे आँचल  में मुंह छिपा कर 
उसके अंत की आहट पर हँसे थे ....
या फिर गुम  हो जाएँ उसी अजनबी मोड़ पे 
जिसके दोनों तरफ लगे, राह बतलाते तीर 
तुमने अपनी ओर घुमा के कहा था 
कि मेरी हर राह सिर्फ तुम तक पहुँचती है ...
लौटना चाहो तो वो मंदिर भी वहीँ है 
जहाँ बरसते पानी की इबारत 
अब भी बिना पढ़े 
समझ ली जाती है ....
ये सब न हो सके तो 
मेरी कविता के आखिरी शब्दों में भी 
लौट सकते हो 
जिनका अर्थ सिर्फ तुम्हारी मौजूदगी में ही 
अपना सा लगता है ......

Friday, 1 March 2013

इतिहास


ये सच है कि 
इतिहास बनाने से पहले 
पूरी शिद्दत से आज को जीना पड़ता है 
फिर भी आधे अधूरे ख्वाब समेटने में 
वक़्त तो लगता है ...
मैं नहीं जानती कुछ भी 
तय करना ,
शायद मुश्किल ही होता होगा 
उतना ही -
जितना काले सफ़ेद अक्षरों का 
किसी रंगीन तस्वीर में तब्दील होना .
क्यारी में खिलते गुलाब और
गमले में उगे कैक्टस का फर्क भी
मुझे तुमने बताया था
अब ये सवाल ना करना कि
अक्सर मेरी कविताओं में झील
और तुम्हारी में रेत क्यूँ हुआ करती है !
तमाम शब्दों का बारूद में बदल जाना
अचानक नहीं होता
विश्वास के परखच्चे उड़कर
तुम्हारे आंगन में भी बिखरेंगे
तब बादलों से कुछ देर और बरसने की
गुज़ारिश न करना ....
बारिशों से तुम्हें यूँ भी नफरत है !
अगली कविता के जन्म से पहले
सारे मौसम धुंधला जायेंगे
तुम चाहो तो अभी से अपनी
यादों की पोटली संभाल के रख दो
अंधेरों से तुम्हें अब भी डर लगता होगा .
हो सके तो कुछ पुरानी मुलाकातें जला देना
कुछ तो नज़र आ ही जायेगा ....
कोशिश करती हूँ कि
आज और अभी जी लूँ बस ,
इतिहास बनते भला क्या देर लगती है ????