चलो एक बार फिर वहीँ लौट जाएँ
जहाँ से रोज़ एक मुस्कराहट को
दफ़न करने के सिलसिले शुरू हुए थे
यूँ न हो कि तमाम उदासियाँ
एक अधूरी नज़्म के ख्याल भर से
खिल उठें .....
चलो लौट जाएँ उस अनकही कहानी की गोद में
जिसके तमाम शब्द
तितर बितर होने से पहले
मेरे आँचल में मुंह छिपा कर
उसके अंत की आहट पर हँसे थे ....
या फिर गुम हो जाएँ उसी अजनबी मोड़ पे
जिसके दोनों तरफ लगे, राह बतलाते तीर
तुमने अपनी ओर घुमा के कहा था
कि मेरी हर राह सिर्फ तुम तक पहुँचती है ...
लौटना चाहो तो वो मंदिर भी वहीँ है
जहाँ बरसते पानी की इबारत
अब भी बिना पढ़े
समझ ली जाती है ....
ये सब न हो सके तो
मेरी कविता के आखिरी शब्दों में भी
लौट सकते हो
जिनका अर्थ सिर्फ तुम्हारी मौजूदगी में ही
अपना सा लगता है ......

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