कोकून
उलझे रेशम सी संवेदनाओं से संवाद करता मन ...कभी कभी तितली बन उड़ जाना चाहता है!!!
Friday, 20 June 2025
Myself
I am a soaked torn paper
Snatched from the book of life
On which neither you can write
Anything fresh and bright
Nor can read previous prints of
Love and strife....!
यज्ञ
तुम्हारे आंसुओं के प्रयागराज में
अभिषेक किया मेरे प्रेम ने
वह पवित्र से पवित्रतर और फिर
पवित्रतम बन गया ।
मैं इसे संध्या का आचमन समझूँ
या यज्ञ का अभिषेक?
आख़िर प्रेम भी तो एक यज्ञ है....!
Thursday, 19 June 2025
माँ, जंगल क्या होता है?
रखना सहेज कर सुरक्षित कहीं
ये निशानियाँ, तस्वीरें और स्मृतियां
वृक्षों की, फूलों की, झरनों की,
क्योंकि पूछेगी आने वाली पीढ़ी कभी
’माँ, जंगल क्या होता है?’
अनजान हैं कितने ही
उस नाज़ुक,मुलायम मखमली जान से
जो सिमट जाती थी लाज से, एक स्पर्श मात्र की।
आज कहाँ है वो वीर बहूटी?
सावन,जो है अभी तो हरा हरा
हो जाएगा तब मैला मैला सा
और बेटियां पूछेंगी अर्थ तुमसे
तीज,मेले और झूलों का।
ढूंढोगी फिर उन चिन्हों को
जो भरोसा दिल सकें कि जिया था कभी सावन
तुमने भी ओढ़ लहरिया, मेंहदी रचे हाथों से।
इसीलिए चाहूंगी कि समेट लो कहीं
वादियों की हरियाली, झूलों की मस्ती,
मेंहदी की लाली, घेवरों की महक और
उस रक्ताभ मखमली ’सावन की डोकरी ’ को।
सजा लो, छुपा लो, संजो लो ये सब
ताकि...
प्रत्युत्तर हो तुम्हारे पास इस चीत्कार करते सवाल का
कि ’माँ, जंगल क्या होता है?’
कल साँझ कितनी उदास थी
बेचैन, ख़ामोश और खोई खोई सी
आज का सूरज भी मलिन और क्लान्त
हवा भी एकदम शान्त थी
मानो धैर्य की प्रतिमूर्ति हो!
चिडियों के कलरव में कहां थी चहक और मस्ती?
आज ही खिला था एक मुरझाया सा गुलाब
न जाने कहां गई उसकी ताज़गी?
सब ओर व्याप्त है सूनापन,
रीती झीलों और बाँझ खलिहानों में भी।
क्या सभी को प्रतीक्षा है तुम्हारी
मेरी ही तरह?
ओ सावन.....
भविष्य
पुराने कबाड़ से भरी दुछत्ती में
अब भी गंधाती है
पूर्वजों के हाथों की महक...
नमी के कटोरे पलकों से
ढक कर रखना
ऑक्सीजन सिलेंडर से चलती
बेतरतीब सांसों का संबल बनेंगे।
घेरों के भीतर मछली पालते भ्रम में
कृत्रिम घास का हरापन उछालें मारेगा ।
पत्थर की चक्की पर
लकीरें खींचते कल की आँखों में
आँगन का सौंधापन कहां से आएगा?
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