उलझे रेशम सी संवेदनाओं से संवाद करता मन ...कभी कभी तितली बन उड़ जाना चाहता है!!!
तुम मुझे उस समय भी सुन सकती हो
जब सूरज का कलेजा
झील की सतह पर डूबते उतरते
सतरंगी हुआ जाता है
और तुम्हें लगता है कि
पहाड़ों की परछाई सिर्फ़ काली सफ़ेद होती हैं...!
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