Thursday, 29 May 2014

मन हुआ परिंदा
शाख के सुर्ख पत्तों में बसाया
सुनहरा घरौंदा अब कहीं आबाद हुआ ।
अब देखना रोज़ समेटेगा
तुम्हारी प्रीत के तिनके
और
चहचहाएगा उम्र के आख़िरी पड़ाव तक ....!
तमाम दर्द रोज़ एक बादल  बन
आसमान में टंग जाते हैं
उम्मीद है सावन में इस बार
खारा पानी ही बरसेगा …… !!!
 सुना है आजकल  चाँद  से  नूर नहीं 
अधजली ख़्वाहिशें  बरसतीं हैं 
पिछली बार मेरे ख़त फूँकते वक़्त 
आँधियाँ गुज़रीं थीं तुम्हारे शहर से …!

Wednesday, 21 May 2014

खुदा से मांगी किसी दुआ का असर है शायद !
बंद आँखों में और भी करीब नजर आते हो तुम !!!

Saturday, 17 May 2014

पीली कनेर सी मुस्कराहट
तुम्हारा हाथ थामते ही आग हो गयी थी
और धुँआ हो गए थे वे तीन शब्द -
जो मेरी जुबाँ से तुम्हारे कानों तक
पहुंचे भी न थे ..... !
सुनो
वक़्त और तारीखें अक्सर मुझे याद रहते हैं
तारीखों पर जमी बर्फ पिघलने पर
लम्हों की तितलियाँ नींद से जाग जाती हैं
 और
वो तमाम ख़्वाहिशें,जो डुबो दी थीं मैंने
झील की गहराई में -
फिर से तैरने लगतीं हैं किनारे की ओर बेतहाशा
देखते ही तुम्हारा अक़्स कहीं आस पास ……
यक़ीनन
वक़्त गुजरने पर उगने लगेंगे वो नीले फूल भी
जिनके रंग उड़ कर कभी
आसमान बन गए थे
देखना -
आज उन तितलियों के पंखों से बनेगा
मेरे और तुम्हारे शहर के बीच एक इन्द्रधनुष
जिसमें घुल कर कल का सूरज
कुछ ज्यादा ही सुनहरा हो जायेगा !!!