Friday, 10 August 2012

भूल जाना कितना अच्छा होता है


भूल जाना कितना अच्छा होता है 
अगर वह गुनगुनी शाम में 
तुम्हारे चेहरे पे टपकती परेशानी का एक कोना हो,
जिसके बाकी तीन हिस्से आंसुओं के सैलाब में 
कश्ती की तरह हिचकोले ले रहे हों ..
भूल जाना सड़क के पार खुली खिड़की से झांकते 
परछाई से सूखे फूलों का भी अच्छा होता है 
जिसे ओस की बूंदों का इंतजार करना 
अपनी महक बिखेरने से ज्यादा भाता है...
यकीन मानो ,
भूल जाना उन गुनगुनाते गीतों का भी अच्छा होता है
 जिनके मायने वक़्त की सजा को कम करने की बजाय
हर घडी को उम्र कैद का दर्ज़ा देने में माहिर हो चुके हों 
और जिनकी उम्मीद के तारों का संगीत 
बेहद बेसुरा हो चुका हो....
कभी कभी सब कुछ भूल जाना भी अच्छा होता है 
बशर्ते कि उसमें तुम्हारी यादों से जुडी 
तमाम छोटी बड़ी हिस्सेदारियों का 
वो एक कतरा भी ना हो 
जिसे सहेज कर रखने में तुमने अपनी उम्र का 
एक बड़ा हिस्सा यूँ ही गुज़ार  दिया था ....
बस यूँ ही भूल जाना सचमुच अच्छा होता है
अगर वो मुमकिन तो हो....!

चलते-चलते


चलते-चलते जब तुम्हारी
पगडंडियों के पांवों में 
छाले पड़ जाएँ -
तो उन्हें मेरी चौखट पे छोड़ जाना
मैं उन्हें धो पोंछ कर 
अपनी ताक में रख दूँगी 
कम से कमतर हो कर ,खो जाने वाले
पलों के बाद यकीनन तुम्हें
दोबारा मेरी तलाश होगी ही....
मैं अपनी पलकों को कस कर भींचना भी
तब बंद करुँगी 
जब हवा में बहती नमी से तुम्हें 
सिहरन होने लगेगी ...
जानते हो ,
उस दिन का अधूरा सफ़र 
अपने बाकी होने पर इतना खुश क्यूँ है?
क्यूंकि उसे पता है कि
अधूरे सिरे को वहीँ से जोड़ना
तुम्हारी आदत नहीं है...
तुम फिर चल कर शुरुआत तक पहुंचोगे
और उलटे पाँव चलते तुम्हारे कदम 
एक बार फिर थक कर 
मेरी ही चौखट पे साँस खीचेंगे.
तुम्हारी तमाम कोशिशों के बावजूद 
ये पग डंडियाँ  मेरी ताक से निकाल कर 
तुम्हारे तलवों के नीचे 
तब तक नहीं बिछेंगी,
जब तक मेरी पलकों का गीलापन 
तुम्हारे चेहरे की हर लकीर से मिल कर 
एक नए किस्से को अंजाम ना दे दे......

Saturday, 4 August 2012



रोज़ इतने दर्द झड़ते हैं आसमान से 
कि समूचा आँचल छटपटा कर 
साँस तोड़ देता है....
कितनी तुरपनें उधड गयी हसरतों की
पर एक टांका भी फुर्सत का 
लगा नहीं पाए तुम-
अब ये कतई ज़रूरी नहीं 
कि तुम्हारे हर सवाल के ज़वाब में 
मुस्कराहटों का समंदर उमड़े 
या फिर 
तुम्हारी हर कविता का आगाज़
मेरे आंसुओं की दस्तक से ही हो ...
ज़रूरी सिर्फ इतना भर है
कि तुम-तुम में ना रहो-
मेरे इर्द-गिर्द घिरी ख़ामोशी की नदी
अब भी दहाड़ें मारने को
बेक़रार है ,
बस तुम ख़ुशी की एक लहर
इस तरफ भी
बहाओ तो सही........!!!