Friday, 10 August 2012

भूल जाना कितना अच्छा होता है


भूल जाना कितना अच्छा होता है 
अगर वह गुनगुनी शाम में 
तुम्हारे चेहरे पे टपकती परेशानी का एक कोना हो,
जिसके बाकी तीन हिस्से आंसुओं के सैलाब में 
कश्ती की तरह हिचकोले ले रहे हों ..
भूल जाना सड़क के पार खुली खिड़की से झांकते 
परछाई से सूखे फूलों का भी अच्छा होता है 
जिसे ओस की बूंदों का इंतजार करना 
अपनी महक बिखेरने से ज्यादा भाता है...
यकीन मानो ,
भूल जाना उन गुनगुनाते गीतों का भी अच्छा होता है
 जिनके मायने वक़्त की सजा को कम करने की बजाय
हर घडी को उम्र कैद का दर्ज़ा देने में माहिर हो चुके हों 
और जिनकी उम्मीद के तारों का संगीत 
बेहद बेसुरा हो चुका हो....
कभी कभी सब कुछ भूल जाना भी अच्छा होता है 
बशर्ते कि उसमें तुम्हारी यादों से जुडी 
तमाम छोटी बड़ी हिस्सेदारियों का 
वो एक कतरा भी ना हो 
जिसे सहेज कर रखने में तुमने अपनी उम्र का 
एक बड़ा हिस्सा यूँ ही गुज़ार  दिया था ....
बस यूँ ही भूल जाना सचमुच अच्छा होता है
अगर वो मुमकिन तो हो....!

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