Saturday, 4 August 2012



रोज़ इतने दर्द झड़ते हैं आसमान से 
कि समूचा आँचल छटपटा कर 
साँस तोड़ देता है....
कितनी तुरपनें उधड गयी हसरतों की
पर एक टांका भी फुर्सत का 
लगा नहीं पाए तुम-
अब ये कतई ज़रूरी नहीं 
कि तुम्हारे हर सवाल के ज़वाब में 
मुस्कराहटों का समंदर उमड़े 
या फिर 
तुम्हारी हर कविता का आगाज़
मेरे आंसुओं की दस्तक से ही हो ...
ज़रूरी सिर्फ इतना भर है
कि तुम-तुम में ना रहो-
मेरे इर्द-गिर्द घिरी ख़ामोशी की नदी
अब भी दहाड़ें मारने को
बेक़रार है ,
बस तुम ख़ुशी की एक लहर
इस तरफ भी
बहाओ तो सही........!!!

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