Friday, 10 January 2014

वो एक शख्स
जो बाँटता है ज़माने भर को खुशियाँ
उसे अपने ज़ख्म गिनने का वक़्त नहीं …
 उन दिनों  बंद खिड़की को बेध कर
दो निगाहें  चला करतीँ थीं उसकी पीठ तले
तब वक़्त नापने की फुर्सत कहाँ थी ?
अब -
प्रेम का विश्लेषण वो  करे या मैं …
नतीज़ा ख़ुशी- ग़म से परे
उँगलियों के पोरों तलक ही
सिमट आया है बस ……!!!