Sunday, 26 April 2020

देखे बहुत मैंने मरुस्थल तपते
सूरज से अग्नि की बरसात होते देखी कितनी ही बार
देखा बहुत बार खौलता समुद्र भाप बनकर उड़ता हुआ
देखे ज्वालामुखी
 पृथ्वी की पथरीली सतह तोड़कर बाहर निकलते -रेत, मिट्टी, पानी, हवा - सब देखे मैंने
तपन के अंतिम छोर तक...
लेकिन कल रात स्वप्न में जब
तुम्हारी देह को छुआ
तब महसूस हुआ कि कहीं नहीं तपन इतनी
तुम्हारी कांची देह जितनी
न रेत, न मिट्टी, पानी न हवा
नहीं - कुछ नहीं तपता
तुम्हारी देह से ज़्यादा....!!

Thursday, 23 April 2020

अब कोई सपना नहीं उगता -
ऐसा नहीं है कि बंजर हुआ है मन
खूब फूटते हैं अंकुर उम्मीदों के
शहर भर की दुआएँ भी साथ होतीं हैं,
कभी कभी बादल भर छींटे उछटते हैं आसपास
पर सपनों की शुरुआत तक कोई नहीं पहुँचता
एक कोना सुलगता ही रहता है...
धुआं-धुआं रिस कर हृदय की दरारों से,
पहुँचेगा ज़रूर तुम तक.
अक्सर -
ख़्वाहिशों की तबाही की वज़ह
चिंगारी ही नहीं,
घुटन भी बनती है...!
नीलम -
सुनो
अब उँगलियों पे गिनती शुरू कर दो
उन आते जाते मुसाफिरों की,
जो बार-बार शहर के इस छोर से उस छोर तक
सिर्फ़ यह देखने के लिए गुजरेंगे
कि अब तक तुम्हारे उलाहनों ने
कितनी बार मेरी पलकों को भिगोया है....!! 

Monday, 6 April 2020

प्रकृति दोहन सदैव विनाश का कारण बना है. इतिहास साक्षी है कि मनुष्य का अहंकार जब जब उसे प्रकृति का स्वामी मानने पर विवश कर देता है, तब तब प्रकृति उसे आईना दिखा देती है. बुद्धिमत्ता इसमें है कि हम उस आइने में वास्तविकता को देखें और सबक सीखें.
मृत्यु कदापि जीवन का आधार नहीं बन सकती .भला शवों पर अट्टालिकाओं का निर्माण कैसे हो सकता है? ईश्वर प्रदत्त प्रकृति के साथ खिलवाड़ करके मनुष्य अपनी मूर्खता ही सिद्ध कर रहा है. महामारियों का प्रकोप एक चेतावनी मात्र है जिसे जितना शीघ्र समझा जाए, उतना ही कुशल है. आशा की किरण अंधकार में अधिक चमकती है. उम्मीदों के बादल दुर्भिक्ष के पश्चात अधिक बरसते हैं. प्रकृति के संकेत समझने का यह अंतिम अवसर है.

Thursday, 2 April 2020

इन दिनों बचपन लौट आया है
सुनाई देते हैं पड़ौस में
दादा दादी के साथ खेलते बच्चों के
क्वीन, वज़ीर, तीन-दो-पाँच जैसे जुमले..
मीठा नीम लेने आयी बच्ची को कल सिखाये
पोषम्पा और गुट्टे के नए खेल
ध्यान से सुनो -
आरतियाँ अब अकेले नहीं गायी जा रहीं...

कॉमिक्स के पन्ने पुनः सरसराने लगे हैं
पिता के साथ बच्चे खिलखिलाने लगे हैं
सब मिल के देख पा रहे हैं
 गौ़र से आम पर बौर का आना
कोयल का कूकना
गिलहरियों का उछलना
चूँकि डोरबैल मौन है इन दिनों..

मोबाइल लगातार चार्ज नहीं हो रहे हैं
गृहिणियों की व्यस्तता
सिर - कमर दर्द की हद तक नहीं जा रही है
और बुज़ुर्ग माथे पर सिलवटों के साथ
चश्मे नहीं सम्भालते
कि बेटा/पोता क्यों न आया अब तक?

उम्र का एक निश्चित तबका निश्चिंत है
कि बाल क्यों रंगने अभी
और चेहरा तो धूल धूप के बग़ैर
यूँ ही मुलायम हो गया है!
छोटी होती जा रही है
फुर्सत में किए जाने वाले कामों की फ़ेहरिस्त -
कैलेंडर तक बदलना याद नहीं रहा पहली बार
सब दिन - एक से तो लग रहे हैं...

ईश्वर से मिल कर हो रही हैं प्रार्थनाएं
बचाने की सिर्फ़ अपना घर-परिवार नहीं
देहरियाँ बढ़ गयी हैं तोड़कर सीमाएँ
राष्ट्र, धर्म, जाति, रंग की.
कि संपूर्ण मानवता बन गई है
एक अरदास!!!