देखे बहुत मैंने मरुस्थल तपते
सूरज से अग्नि की बरसात होते देखी कितनी ही बार
देखा बहुत बार खौलता समुद्र भाप बनकर उड़ता हुआ
देखे ज्वालामुखी
पृथ्वी की पथरीली सतह तोड़कर बाहर निकलते -रेत, मिट्टी, पानी, हवा - सब देखे मैंने
तपन के अंतिम छोर तक...
लेकिन कल रात स्वप्न में जब
तुम्हारी देह को छुआ
तब महसूस हुआ कि कहीं नहीं तपन इतनी
तुम्हारी कांची देह जितनी
न रेत, न मिट्टी, पानी न हवा
नहीं - कुछ नहीं तपता
तुम्हारी देह से ज़्यादा....!!
सूरज से अग्नि की बरसात होते देखी कितनी ही बार
देखा बहुत बार खौलता समुद्र भाप बनकर उड़ता हुआ
देखे ज्वालामुखी
पृथ्वी की पथरीली सतह तोड़कर बाहर निकलते -रेत, मिट्टी, पानी, हवा - सब देखे मैंने
तपन के अंतिम छोर तक...
लेकिन कल रात स्वप्न में जब
तुम्हारी देह को छुआ
तब महसूस हुआ कि कहीं नहीं तपन इतनी
तुम्हारी कांची देह जितनी
न रेत, न मिट्टी, पानी न हवा
नहीं - कुछ नहीं तपता
तुम्हारी देह से ज़्यादा....!!