Thursday, 2 April 2020

इन दिनों बचपन लौट आया है
सुनाई देते हैं पड़ौस में
दादा दादी के साथ खेलते बच्चों के
क्वीन, वज़ीर, तीन-दो-पाँच जैसे जुमले..
मीठा नीम लेने आयी बच्ची को कल सिखाये
पोषम्पा और गुट्टे के नए खेल
ध्यान से सुनो -
आरतियाँ अब अकेले नहीं गायी जा रहीं...

कॉमिक्स के पन्ने पुनः सरसराने लगे हैं
पिता के साथ बच्चे खिलखिलाने लगे हैं
सब मिल के देख पा रहे हैं
 गौ़र से आम पर बौर का आना
कोयल का कूकना
गिलहरियों का उछलना
चूँकि डोरबैल मौन है इन दिनों..

मोबाइल लगातार चार्ज नहीं हो रहे हैं
गृहिणियों की व्यस्तता
सिर - कमर दर्द की हद तक नहीं जा रही है
और बुज़ुर्ग माथे पर सिलवटों के साथ
चश्मे नहीं सम्भालते
कि बेटा/पोता क्यों न आया अब तक?

उम्र का एक निश्चित तबका निश्चिंत है
कि बाल क्यों रंगने अभी
और चेहरा तो धूल धूप के बग़ैर
यूँ ही मुलायम हो गया है!
छोटी होती जा रही है
फुर्सत में किए जाने वाले कामों की फ़ेहरिस्त -
कैलेंडर तक बदलना याद नहीं रहा पहली बार
सब दिन - एक से तो लग रहे हैं...

ईश्वर से मिल कर हो रही हैं प्रार्थनाएं
बचाने की सिर्फ़ अपना घर-परिवार नहीं
देहरियाँ बढ़ गयी हैं तोड़कर सीमाएँ
राष्ट्र, धर्म, जाति, रंग की.
कि संपूर्ण मानवता बन गई है
एक अरदास!!!

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