सुनो नीलकंठ
अब उतार लो ये विष अपने जेहन में
क्यूंकि भीतर तक समाया यह विष
तुम्हारे शब्दों में अवश्य असर दिखाएगा ,
उसके बाद तुम लिखना एक उपन्यास -
ज़हर बुझे पन्ने-दर-पन्ने ,
इतिहास-दर-इतिहास -
जब तक तुम खाली न हो जाओ
अपनी समस्त विषमताओं से....!
अब उतार लो ये विष अपने जेहन में
क्यूंकि भीतर तक समाया यह विष
तुम्हारे शब्दों में अवश्य असर दिखाएगा ,
उसके बाद तुम लिखना एक उपन्यास -
ज़हर बुझे पन्ने-दर-पन्ने ,
इतिहास-दर-इतिहास -
जब तक तुम खाली न हो जाओ
अपनी समस्त विषमताओं से....!
तभी कर सकोगे तुम वैसा ही प्रेम मुझसे
जैसा होता है मिट्टी का रंग
जो लाख कोशिशों के बावज़ूद भी,बदलता नहीं -
या गंगा की लहरों के घाट से टकरा कर
लौट जाने सा प्रेम
या फिर विषधरों की दहकती साँसों से भी
न पिघलने वाला ...अमृत सा प्रेम ...!
जैसा होता है मिट्टी का रंग
जो लाख कोशिशों के बावज़ूद भी,बदलता नहीं -
या गंगा की लहरों के घाट से टकरा कर
लौट जाने सा प्रेम
या फिर विषधरों की दहकती साँसों से भी
न पिघलने वाला ...अमृत सा प्रेम ...!
सुनो नीलकंठ
भस्म तो तुमने भी रमाई है अपने तन पे
न जाने कितने सुनहरे ख्वाबों के ख़ाक होने पर बची
भभूति है ये -
अबकी बार डुबकी लगा कर बहा आना सब गंगा में ...
मछलियों के नेत्र भी देखना सीख जाएंगे कुछ सपने !
भस्म तो तुमने भी रमाई है अपने तन पे
न जाने कितने सुनहरे ख्वाबों के ख़ाक होने पर बची
भभूति है ये -
अबकी बार डुबकी लगा कर बहा आना सब गंगा में ...
मछलियों के नेत्र भी देखना सीख जाएंगे कुछ सपने !
हर बार की तरह प्रलय का वास्ता देकर
मत भरमाना मुझे
जिस दिन तुम्हारे कंठ का नीलापन
शब्दों से परे होकर तांबई-सा हो जाएगा
मैं अमृत हो जाऊँगी ...!
फिर तुम्हारे उपालम्भों का मध्यम चक्षु
कितनी ही पीड़ाओं में डुबो दे मुझे
अटल हिम-पुत्री-सा इतिहास लिखे बगैर
मैं प्रेम में बस
जीती ही जाऊँगी ....जीती ही जाऊँगी ...!!!
मत भरमाना मुझे
जिस दिन तुम्हारे कंठ का नीलापन
शब्दों से परे होकर तांबई-सा हो जाएगा
मैं अमृत हो जाऊँगी ...!
फिर तुम्हारे उपालम्भों का मध्यम चक्षु
कितनी ही पीड़ाओं में डुबो दे मुझे
अटल हिम-पुत्री-सा इतिहास लिखे बगैर
मैं प्रेम में बस
जीती ही जाऊँगी ....जीती ही जाऊँगी ...!!!