Saturday, 19 November 2011

कुछ कहे बिना



कुछ कहे बिना 
समझते समझते 
आखिरी सन्नाटे ने भी 
मुंह फेर लिया ,
सारा मौन मिल कर 
चीखने लगा और
शोर में दबी सिसकियों ने
घर छोड़ने से पहले
पता भी न पूछा मेरे मोहल्ले का ....
अब भी उन चुप्पियों का तीखापन
हवा में घुल कर
तलाश रहा है
मेरे मन के कोनों में छिपी
सीली सीली सी सुलगन को -
जलाने या बुझाने के लिए ....

Thursday, 17 November 2011



मैं उस दिन का इंतजार करुँगी 
जब तुम्हारी हथेलियों से छन कर आती धूप 
उतरेगी मेरे चेहरे पर 
और उनींदी आंखे खोलने पर 
देखूंगी तुम्हारे भीगे बालों से टपकती बूंदों को .

हो सकता है तब तक 
तुम इतने बदल जाओ 
कि नाम तक भुला दो मेरा 
और पूछो अचकचा कर 
कौन हो तुम ???

तब में अगले पिछले सारे वादों की
ओढ़नी समेट कर रख दूँगी 
और फिर से तुम्हारे प्रश्नों के उत्तर 
एक झीने से आवरण में बुन कर 
इस तरह डाल दूँगी तुम्हारे अनमने भावों पर 
कि तुम उनकी पारदर्शिता में 
कुछ न छिपा पाओगे मुझसे ...

कौन नहीं जानता कि बादल, हवा जरुरी है सबके लिए ?
रेत में बनते -बिगड़ते आकारों को
 हमेशा गिनते रहना बेमकसद है ?
या पेड़ पर लगे पत्ते झरने से पहले 
ज़रा-सा कंपकपाते हैं ?

फिर भी इन सवालों के घिसे -पिटे जवाब 
मिलेंगे तुम्हें बार बार 
लगातार !
इसलिए नहीं कि मेरे उत्तर 
तुम्हारे अनमनेपन को बेगाना कर देंगे -
बल्कि इसलिए कि 
तुहारे प्रश्नों के जुड़ने -घटने से ही 
मैं अपनी ज़िन्दगी के गणित के सारे प्रमेय 
सरलता से समझ पाती हूँ ........

Friday, 11 November 2011

चाहे जो भी हो



जी चाहता है किसी दिन 
तुम्हारे दिलो -दिमाग में भरा 
सारा ज़हर निकाल कर 
बिखेर दूँ अपनी छत पर .
धूप उतरेगी 
तपाएगी उसे ,
फिर शायद भाप -सा 
घुल जाये हवा में ....
रेत के गुबारों से अट जाएँगी 
मुहल्ले क़ी सड़कें ,
बौछारें सक्पकायेंगी
मेरी गली में बरसने से ,
तीखी चुभन से कस्मासयेंगे 
सारे दरख़्त ,
और ज़हरीली तपन से झुलसेंगे 
पंछी -पौधे .....
चाहे जो भी हो -
भुलाना होगा हर हाल में 
उन गर्म हवाओं को 
मेरे शहर से
तुम्हारे दिलो -दिमाग तक का रास्ता !!!!!!

Monday, 7 November 2011

यूँ ही लिखते रहो तुम


यूँ ही लिखते रहो तुम 
बसंती से इस मौसम में 
अपनी प्रेम कवितायेँ 
जो शब्द छंदों की परिधि माने बगैर 
डूबती उतरती रहती है 
संबंधों की उन्मुक्त नदी में 
तपा जाती हैं 
देह और मन दोनों को ही 
गुनगुनी धूप -सी 
और बावरा सा मन 
न जीता है न मरता ......
        नन्हा सा सुख 
       स्मृतियों में  भी छिपा होता है 
        जो हवा की गंध समेटे 
        उतर जाता है आत्मा तक
        नदियों की धार पर 
       पक्षियों की चोंच सा 
       संगीत देता हुआ ......
तुम लिखते रहो यूँ ही 
चाह कर भी न टूटेंगी कुछ खामोशियाँ 
जो दबा रखी हैं उन तमाम मौसमों ने 
अपनी कटोरा भर हँसी के बोझ तले
जो रह रह कर 
जल तरंग सा बजा जाते हैं 
बगैर ये जाने क़ि तुम उन्हें 
अनुशासित करने की बात कहते हुए 
भूल जाते हो उनमे पहले
जीवन फूंकना ......

Wednesday, 2 November 2011

तुम्हारे जाने के बाद ..........

तुम्हारे जाने के बाद 
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जब तुम मिलने आओ 
तो पूरब की हवा की सारी
नमी लेते आना 
जिसे मैं अपनी
झीलों के किनारे छोड़ दूंगी 
और हमारे शहर का हर कोना 
तुम्हारी गंगा सा पवित्र हो जायेगा .
      तुम चाहो तो चाँद सितारे सी 
      वो बिंदिया भी लेते आना 
      जो सड़क पार वाली उस दुकान पर
     मैं यूँ ही छोड़ आई थी चलते चलते 
     जबकि मैं जानती थी कि
     वो मेरे माथे को सूरज बना देगी  .
लाना चाहो तो अपने घर के 
पिछवाड़े के कोने में थमी 
वो धूप भी लेते आना 
जिसमें अक्सर तुम्हारी गिलहरी 
सुस्ताया करती थी 
जाड़े के दिनों में  .
       यूँ तो बादल की वह चादर भी 
      अब तक वहीँ सूख रही होगी 
      तुम्हारी छत की अलगनी पर 
     जिसमें सफ़ेद रंग के धुंधले से 
      फूल काढने लगी थी मैं 
      और तुमने कहा था 
     इसे हरा बना दो  .
आते हुए  माँ के हाथों की 
खुशबू भी समां लाना 
अपने लापरवाह से बालों में 
जिनमें सिरदर्द का बहाना करके 
तुम बार बार तेल लगवाते थे 
और मैं तकिये के गिलाफ को 
गर्म पानी में डुबोना 
भूल जाया करती थी .
       अगर ये सब कुछ तुम न भी लाओ 
       तो ऐसा कुछ नहीं होगा 
       तुम्हारे आने पर 
      कि तुम फिर कभी न आने का 
       वादा कर सको 
      मेरी झीलें ,मेरी बिंदिया ,
      मेरी धूप ,मेरी धड़कन -
     कुछ भी नहीं बदलेगा .
     ये सब कुछ हमेशा बदलता है 
      सिर्फ तुम्हारे जाने के बाद ..........