जी चाहता है किसी दिन
तुम्हारे दिलो -दिमाग में भरा
सारा ज़हर निकाल कर
बिखेर दूँ अपनी छत पर .
धूप उतरेगी
तपाएगी उसे ,
फिर शायद भाप -सा
घुल जाये हवा में ....
रेत के गुबारों से अट जाएँगी
मुहल्ले क़ी सड़कें ,
बौछारें सक्पकायेंगी
मेरी गली में बरसने से ,
तीखी चुभन से कस्मासयेंगे
सारे दरख़्त ,
और ज़हरीली तपन से झुलसेंगे
पंछी -पौधे .....
चाहे जो भी हो -
भुलाना होगा हर हाल में
उन गर्म हवाओं को
मेरे शहर से
तुम्हारे दिलो -दिमाग तक का रास्ता !!!!!!

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