Friday, 11 November 2011

चाहे जो भी हो



जी चाहता है किसी दिन 
तुम्हारे दिलो -दिमाग में भरा 
सारा ज़हर निकाल कर 
बिखेर दूँ अपनी छत पर .
धूप उतरेगी 
तपाएगी उसे ,
फिर शायद भाप -सा 
घुल जाये हवा में ....
रेत के गुबारों से अट जाएँगी 
मुहल्ले क़ी सड़कें ,
बौछारें सक्पकायेंगी
मेरी गली में बरसने से ,
तीखी चुभन से कस्मासयेंगे 
सारे दरख़्त ,
और ज़हरीली तपन से झुलसेंगे 
पंछी -पौधे .....
चाहे जो भी हो -
भुलाना होगा हर हाल में 
उन गर्म हवाओं को 
मेरे शहर से
तुम्हारे दिलो -दिमाग तक का रास्ता !!!!!!

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