Sunday, 22 April 2012



जब भी उखाड़ फेंकते हो मुझे तुम 
अपने जीवन की हरी भरी ज़मीन से 
आस पास उगे खरपतवार की तरह -
मेरी संवेदनाओं की कंटीली झाड़ियाँ 
तुनक कर और भी तीखी हो जाती हैं...
मिटटी का सारा कच्चापन ,सौंधापन 
तड़कने लगता है ,
नुकीले शब्दों की जड़ों के बिंधने से -
बादलों के कहकहे भी
मुस्कराहटों के फूल खिला नहीं पाते
और जमती जाती है
अवसाद की परत दर परत
समूचे अस्तित्व के कोने कोने पर -
एक अदद ताज़ा हवा के इंतजार में
कितने ज़नम गुज़ारूँ मैं ???

कहीं कुछ नहीं बदला



सूरज के रोज़ सुबह पेड़ पर टंगने
और चाँद के दिन भर उबासी लेने के बीच 
कहीं कुछ नहीं बदला है ...
शाम की स्याही भुनभुनाती सी बिखरती है ,
तारों को याद दिलाना पड़ता है खिलखिलाना ,
और हवा की मुस्कराहट, राह भटक भटक जाती है ...
       दर्द की सिहरन भी वैसी ही है 
       पीड़ा सिर्फ मुख़्तार माई का नाम नहीं 
       हरी घास का अचानक चरमरा कर सूख जाना भी 
       दिल दुखा जाता है .
       अब भी किसी के मन की तरलता 
       अपनी ओर बहती देख 
       हकीकत पानी पानी हो जाती है 
       और सपने ....वाष्पीकृत .
बदली तो रोज़ आने जाने से बनी 
रिश्तों की पगडण्डी भी नहीं ,
क़दमों के सूखे निशानों से,
 पपडीदार मुलम्मे-- अब भी चढ़ते हैं .
बहते पानी की कलकल 
अब सिर्फ आँखों में सुनाई देती है 
बाकी मुखौटे से चेहरे अक्सर 
बोलों की खूँटी पर टंगे रहते हैं ....
         फिर जब कहीं कुछ नहीं बदला 
         तो दर्द का पीलापन 
         कमरे में रखे गमले सा 
         हरा कैसे हो जायेगा?
         मौन के दायरे 
          लकड़ी की सीढ़ी से टिके
          दरख़्त की मानिंद कैसे झुक जायेंगे?
          सुबह के सपने झूठ की चादर ओढ़ 
          भला कब तक सोये रहेंगे?
और तब तक ---
मेरी कलम से तुम्हारे भावों का न बहना 
लगभग असंभव होगा ,
वैसा ही ,जैसे तन्हाई और दर्द की 
रोज़ रोज़ की मुलाकात का 
अचकचाकर हाथ छुड़ा लेना ..........!!!

Sunday, 15 April 2012

अब भी ताकता है




अब भी ताकता है आसमान
धूप और बादल की गुफ्तगू से बनी
तुम्हारी धुंधली सी तस्वीर को एकटक ...
न जाने कब एक गुनगुनी बूँद
तुम्हारी कोई बात मेरी हथेली में
छम से थमा जाये -
और मैं झुलसती रहूँ ताउम्र
पसीजते मौसम को बददुआएं देती
हवाओं को पलट कर न देखने की
कसमें देती और-
मुठ्ठी की कसमसाहट में दम तोडती
तुम्हारी उस आखिरी बात पर
अपने वजूद को नकारने की कोशिश करती
गुनगुनी बूँद की पैदाइश को ....
सौ सौ सूरजों की तपिश झेल कर
अब भी उगना चाहती हूँ
उसी रेगिस्तान की बंज़र ज़मीन पे
जहाँ रख दी थी हथेली अपनी
देख कर छले तुम्हारे पाँव के ....

Monday, 9 April 2012

किसने कहा



किसने कहा तुमसे 
आज फिर तस्वीरों को उलट कर ,
झाड कर ,टंगा दो दीवारों पर
जबकि उनमें छपे चेहरे 
बदरंग हो गए हैं?
         एक बार फिर उल्टे क़दमों से 
        नापने लगे हो आंगन की चौड़ाई 
         जबकि उसके कोनों को 
         घेर लिया है काँटों भरी झाड़ियों ने .
यह जानते हुए भी 
कि चाँद रोज़ पूरा नहीं निकलता 
ताकते रहते हो छत से घंटों उसे -
मानो तुम्हारी निगाहों से खींची लकीरों से 
पूरी हो जाएगी उसकी परिधि ...
         कल भी सड़क की धूप को 
         सरका लिया तुमने ,
         अपने कमरे के कोने तक 
         फिर पूछते रहे हवाओं से 
         आज पेड़ उतने हरे क्यों नहीं ?
यूँ ही उलटते रहते हो 
मेरी डायरी के पन्ने 
जबकि जानते हो 
वही शब्द लिखे होंगे उसमें 
रोज़ रोज़ ,बार बार 
जिनमें अक्सर तुम्हारा ज़िक्र होता है ...
       न जाने क्यूँ नयापन ढूंढ नहीं पाते तुम 
       कुदरत की कलम से लिखी इबारत में ?
      मुझे तो यह तस्वीर ,आंगन ,चाँद पेड़ और शब्द ...
      सब कुछ बदलता दिखता है 
       बिना बदले हमारे -
       रिश्तों के समीकरण !!!

Tuesday, 3 April 2012



अपने हाथों में नई उँगलियाँ उगा कर 
लिखना चाहती हूँ मैं तुम्हारे बारे में 
कुछ अलग शब्द ,भाषा और व्याकरण -
एक नया शब्दकोश बना कर 
रचना चाहती हूँ वह कविता 
जिसमें घुले आंसू ,धो-पोंछ कर लिख सकें 
तुम्हारे अनुत्तरित प्रश्नों के उत्तर 
जो अब तक इंतज़ार में हैं ,तुम्हारे वर्तमान के 
इतिहास में बदल जाने के........
             मैं गढ़ना चाहती हूँ एक नई इबारत 
             किताब के उन पन्नों से 
             जो बार बार फडफडIए तो -
             मगर तुम्हारी हथेलियों में पसीजने से पहले ही  
             एक मातमी गीत सुना कर बंद हो गए ..
             उस गीत की गूँज आज भी 
             मेरी नज़र को कभी कभी धुंधला कर देती है 
             और क़दमों को बेगाना.......
एक दिन अचानक जन्म देना चाहती हूँ 
अभिमंत्रित सी ,बेसुध अभिव्यक्ति को 
जो ऑंखें खुलते ही देख सके 
वे सारे सपने एक ही रात में-
जिनकी आहट भी कतराती है आने से 
कई कई जन्मों के गुज़र जाने तक
और धीरे धीरे अर्थ ही खो देते हैं वे 
अपने होने ,सँवरने,दिखने और साकार होने का......
              मुझे जीना है अभी तो पूरा एक भविष्य 
              जो कंपकपाते होठों के किनारे रुका पड़ा है 
             तुम्हारे इतिहास,गीत और अभिव्यक्ति के साथ-
             रेत में दबी नमी सा ,अकेला ,
             अपने भूरेपन में हरियाली छिपाए 
             वक़्त की नारंगी किरणों की तपिश को झेलता 
            मिचमिचाती आँखों से वीरानों को ताकता .....
अभी तो बाकी है हमारी पलकों की नमी से 
नखलिस्तान में वो सारे फूल उगाना 
जिनकी महक अब भी -
हमारी चुप्पियों से बनी कविता सी ताज़ा है.....!