अपने हाथों में नई उँगलियाँ उगा कर लिखना चाहती हूँ मैं तुम्हारे बारे में
कुछ अलग शब्द ,भाषा और व्याकरण -
एक नया शब्दकोश बना कर
रचना चाहती हूँ वह कविता
जिसमें घुले आंसू ,धो-पोंछ कर लिख सकें
तुम्हारे अनुत्तरित प्रश्नों के उत्तर
जो अब तक इंतज़ार में हैं ,तुम्हारे वर्तमान के
इतिहास में बदल जाने के........
मैं गढ़ना चाहती हूँ एक नई इबारत
किताब के उन पन्नों से
जो बार बार फडफडIए तो -
मगर तुम्हारी हथेलियों में पसीजने से पहले ही
एक मातमी गीत सुना कर बंद हो गए ..
उस गीत की गूँज आज भी
मेरी नज़र को कभी कभी धुंधला कर देती है
और क़दमों को बेगाना.......
एक दिन अचानक जन्म देना चाहती हूँ
अभिमंत्रित सी ,बेसुध अभिव्यक्ति को
जो ऑंखें खुलते ही देख सके
वे सारे सपने एक ही रात में-
जिनकी आहट भी कतराती है आने से
कई कई जन्मों के गुज़र जाने तक
और धीरे धीरे अर्थ ही खो देते हैं वे
अपने होने ,सँवरने,दिखने और साकार होने का......
मुझे जीना है अभी तो पूरा एक भविष्य
जो कंपकपाते होठों के किनारे रुका पड़ा है
तुम्हारे इतिहास,गीत और अभिव्यक्ति के साथ-
रेत में दबी नमी सा ,अकेला ,
अपने भूरेपन में हरियाली छिपाए
वक़्त की नारंगी किरणों की तपिश को झेलता
मिचमिचाती आँखों से वीरानों को ताकता .....
अभी तो बाकी है हमारी पलकों की नमी से
नखलिस्तान में वो सारे फूल उगाना
जिनकी महक अब भी -
हमारी चुप्पियों से बनी कविता सी ताज़ा है.....!