किसने कहा तुमसे
आज फिर तस्वीरों को उलट कर ,झाड कर ,टंगा दो दीवारों परजबकि उनमें छपे चेहरेबदरंग हो गए हैं?एक बार फिर उल्टे क़दमों सेनापने लगे हो आंगन की चौड़ाईजबकि उसके कोनों कोघेर लिया है काँटों भरी झाड़ियों ने .यह जानते हुए भीकि चाँद रोज़ पूरा नहीं निकलताताकते रहते हो छत से घंटों उसे -मानो तुम्हारी निगाहों से खींची लकीरों सेपूरी हो जाएगी उसकी परिधि ...कल भी सड़क की धूप कोसरका लिया तुमने ,अपने कमरे के कोने तकफिर पूछते रहे हवाओं सेआज पेड़ उतने हरे क्यों नहीं ?यूँ ही उलटते रहते होमेरी डायरी के पन्नेजबकि जानते होवही शब्द लिखे होंगे उसमेंरोज़ रोज़ ,बार बारजिनमें अक्सर तुम्हारा ज़िक्र होता है ...न जाने क्यूँ नयापन ढूंढ नहीं पाते तुमकुदरत की कलम से लिखी इबारत में ?मुझे तो यह तस्वीर ,आंगन ,चाँद पेड़ और शब्द ...सब कुछ बदलता दिखता हैबिना बदले हमारे -रिश्तों के समीकरण !!!

wah ,rishton me nayapan khijne kee nayab koshish . us prachin me kuchh arvachin dekhna ,yah sambandhon kee pragadhta ke liye behad jaruri hai. badhi Neelam jee itnee sundar rachna prastut karne ke liye :)
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