कैसा होगा वह दिन जब हथेलियों में रूपये उगाने क़ी ज़द्दोज़हद में
तुम्हारी उँगलियों क़ी पकड़
ढीली हो जाएगी तुम्हारी कलम से
और तुम बुनोगे
कुछ अजीब से ख्वाब अपनी आँखों में -
पानी का नीलापन नज़र आयेगा
सिर्फ मछलियों से सजे ड्राइंग रूम में ,
हवा का सौंधापन लील जाएगी
कमरे क़ी ठंडक
और मिटटी का भूरापन
तरसेगा तुम्हारे क़दमों के स्पर्श को ....
फिर भी यकीनन सब कुछ नहीं बदलेगा
मैं तब भी वही रहूंगी
तुम्हें सुनती और गुनती ---
हमारे बीच के रंग भी धुआं नहीं होंगे
धमनियों में बजता संगीत भी
बेसुरा नहीं होगा कभी
यह भी हो सकता है क़ि
तुम्हारी हथेलियों को
उतनी आदत न पड़े रूपये उगाने क़ी
या उँगलियों का खुरदरापन
मजबूत ही रखे कलम पर तुम्हारी पकड़
लेकिन तुम्हारे ख्वाबों क़ी अजनबियत
तुममे तुमको ढूँढने की
इतनी कवायद नहीं कर सकेगी
जितनी-
एक आदमी के आदमी बने रहने में होती है