Tuesday, 31 January 2012

एक कतरा अँधेरा .....



लगता है मेरे भीतर 
एक और दरवाजा है 
खुलता - बंद होता 
खडखड़Iता .धड धडाता- 
उसकी एक झिरी से 
सूरज के उलाहने आते हैं 
और सायों की शक्ल में 
घटते बढते रहते हैं ...
जब उनके खातों के 
सारे जोड़ बाकी
ह्रदय के रक्त को उलीचते हैं 
मेरी आँखों तक -
तो भरभरा के ढह जाता है 
वह दरवाजा और 
उघड जाता है रौशनी के दायरे में 
समेटा हुआ एक कतरा अँधेरा .....

Saturday, 28 January 2012

कैक्टस



तुम्हारे और मेरे बीच उगे कैक्टस में 
आज पहली बार एक फूल खिला 
कुछ पीला गुलाबी सा ...
अब तक तो कांटे ही कांटे थे उसमें 
उलझे ,बेतरतीब ,अनगिनत 
न जाने कैसे बचता -बचाता 
तितली के नाज़ुक परों सा 
नन्हा किन्तु दृढ़ ,चार पंखुड़ी वाला ...
भूरी  मिटटी में तुम्हारी गंध समेटे 
इस एक फूल ने आज बना दिया मुझे 
horticulture के विषय का ज्ञानी 
मैं जानती हूँ बीज के बोने से लेकर 
फूल के उगने तक में 
संबंधों के रेशों की कोमलता 
यकीनन कहीं आडे नहीं आती.....

Friday, 6 January 2012

जब जब जनमती है तुम्हारी कविता



जब जब जनमती है तुम्हारी कविता 
मेरी कोख की पीड़ा हरी हो जाती है -
सारी संवेदनाएं उथल -पुथल मचाती हुई 
ह्रदय से उँगलियों तक का सफ़र 
तय कर लेती हैं और 
कागज की छट पटाहट
कुछ देर के लिए ही सही -
शांत हो जाती है
.           मगर हमेशा ऐसा नहीं होता -
            कई बार समेटे ही नहीं जाते शब्द ...
            ऐसे में बिखर -बिखर जाती हैं पीडाएं 
           यहाँ -वहां ,
           अधूरे भ्रूण सी ,
           अपने होने ,न होने को कोसती 
           सूने -सपाट सन्नाटों से बतियाती ...
          उलहानों का इतिहास बनाती.
सुनो ---
उँगलियों और कलम का अंतर 
तुम्हारे शब्द समझते होंगे ,
मेरे नहीं-

Sunday, 1 January 2012

कैसा होगा वह दिन



कैसा होगा वह दिन 
जब हथेलियों में रूपये उगाने क़ी ज़द्दोज़हद में 
तुम्हारी उँगलियों क़ी पकड़ 
ढीली हो जाएगी तुम्हारी कलम से 
और तुम बुनोगे
कुछ अजीब से ख्वाब अपनी आँखों में -
पानी का नीलापन नज़र आयेगा 
सिर्फ मछलियों से सजे ड्राइंग रूम में ,
हवा का सौंधापन लील जाएगी 
कमरे क़ी ठंडक 
और मिटटी का भूरापन 
तरसेगा तुम्हारे क़दमों के स्पर्श को ....
फिर भी यकीनन सब कुछ नहीं बदलेगा 
मैं तब भी वही रहूंगी 
तुम्हें सुनती और गुनती ---
हमारे बीच के रंग भी धुआं नहीं होंगे 
धमनियों में बजता संगीत भी 
बेसुरा नहीं होगा कभी 
यह भी हो सकता है क़ि 
तुम्हारी हथेलियों को 
उतनी आदत न पड़े रूपये उगाने क़ी
या उँगलियों का खुरदरापन 
मजबूत ही रखे कलम पर तुम्हारी पकड़ 
लेकिन तुम्हारे ख्वाबों क़ी अजनबियत 
तुममे तुमको ढूँढने की 
इतनी कवायद नहीं कर सकेगी 
जितनी-
एक आदमी के आदमी बने रहने में होती है