Saturday, 28 January 2012

कैक्टस



तुम्हारे और मेरे बीच उगे कैक्टस में 
आज पहली बार एक फूल खिला 
कुछ पीला गुलाबी सा ...
अब तक तो कांटे ही कांटे थे उसमें 
उलझे ,बेतरतीब ,अनगिनत 
न जाने कैसे बचता -बचाता 
तितली के नाज़ुक परों सा 
नन्हा किन्तु दृढ़ ,चार पंखुड़ी वाला ...
भूरी  मिटटी में तुम्हारी गंध समेटे 
इस एक फूल ने आज बना दिया मुझे 
horticulture के विषय का ज्ञानी 
मैं जानती हूँ बीज के बोने से लेकर 
फूल के उगने तक में 
संबंधों के रेशों की कोमलता 
यकीनन कहीं आडे नहीं आती.....

3 comments:

  1. Yes now a days working on a very important assignment. So seeking solitude. Well will be back soon. Posted two poems on my blogs ....waiting for your comments over there.....

    -Niraj

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