Sunday, 25 March 2012



कल फिर रात देर तक 
चाँद की उंगली थामे 
पूरा चक्कर लगा आयी 
छत से आसमान तक ....
सुबह होने पर एक एक तारे ने
बिना ऑंखें खोले ही भांप ली 
मेरे सपनों की हकीकत और 
बांध आये चाँद को सागर किनारे 
लहरों की डोरी से ......
नदी किनारे के पत्थर सी 
गोल गोल हुई जाती
सारे ज़माने की संवेदनाएं
सिमट कर चुपचाप
बैठ गयीं एक कोने में -
इंतजार में गिरह खुलने की ,
मगर लहरों की डोरी
और भी नमकीन होती गयी ....
आज निकली है
हवा से कानाफूसी करते
सितारों की जगमगाती रात -
कुछ नहीं बदला -
वही रौशनी, वही नज़ारा...
उधर संदेह को उलांघने की जिद में
चाँद घिर गया है
उलाहनों की कंटीली खरपतवार से -
मुक्ति -बंधन,असमंजस -निश्चय .....
क्या चाँद का फिर से टंगना
ज़रूरी है असमान में?????
 

Tuesday, 13 March 2012

किताब के पन्नों


किताब के पन्नों के
खुलने और बंद होने के बीच
फडफडIते हैं कई शब्द -
संप्रेषित होने की आस में
अनेकों बार छटपटाते हैं ,
गिनती रहती हूँ मैं उनका
यात्रांत की प्रतीक्षा में
बार बार शुरुआत तक जाना
उनकी भूख, मेरी प्यास से नहीं मिटती
कभी मिट कर ,कभी लिख कर ,
चुभन का निरंतर अहसास कराना
उन्हें खूब आता है ....
यही सब एक आदत सा
मेरे साथ साथ चलता है
रग-रग में बहता है ...
इसीलिए अपनी बिखरी हुई
कहानी समेट कर
अक्सर सोचती हूँ
काश ....
शब्दों की यह फडफडIहट
अनंत की ऊंचाइयों तक जाकर चीखे
और तब्दील हो सके
हमारे बीच पसरे
मौन की आवाज़ में .....

तुम्हारे शहर से

तुम्हारे शहर से मुझ तक की दूरी 
कम तो होगी 
धरती से सूरज के बीच की दूरी से 
परन्तु 
आठ मिनिट से ज्यादा वक़्त 
लग जाता है हमेशा 
तुम्हारे भभकते हुए शब्दों की रौशनी को 
मुझ तक पहुँचने में 
और इसी बीच -
उग जाते हैं वे ज़हरीले पौधे 
जिनके बीज भीगे थे 
तुम्हारे संदेहों की बौछारों में 
और बिंध गए थे गहरे 
मेरे अंतर की उपजाऊ मिटटी में .....
अब -
उखाड़ नहीं पाती हूँ उन्हें जड़ से ,
जानती हूँ कालांतर में 
इतना फ़ैल जायेगा यह जंगल
कि तुम्हारे अहसासों की आवाज़ 
गुम हो जाएगी यहाँ 
और लौट जाएगी तुम तक 
बार बार 
प्रतिध्वनित होकर .........!

Saturday, 10 March 2012

इल्जाम



पंजों पे उचकते बच्चों की तरह 
उजाले की खिड़की खोलने के प्रयास में 
कई बार किनारे का तीखापन 
महसूस ही नहीं होता ...
अँधेरे से दूर भागने की जिद 
हवा का ज़हारीलापन भी 
अनसुना कर देती है ......
और-
यहीं कहीं हो जाती है 
दहलीजों को शिकायत .
तहजीब और तोहमतों के 
बेमियादी सफ़र को 
विराम लगाने की पहल 
चलो मुझसे ही सही .....
कम से कम तुम्हारे इल्जामों में 
यह एक तो आखिरी होगा .....!!!

Thursday, 8 March 2012

एक सवाल



तुम्हारी संवेदनाओं और 
मेरी भावनाओं के
एकाकार होने के प्रयास में 
तितर -बितर हो गए 
वे सब रंग ,
जो समेटे थे इस होली के लिए -
रह गया सिर्फ 
एक बिखरा हुआ इन्द्रधनुष .....
क्या तुम्हारे शब्द,
तुम्हारी चाहत ,
तुम्हारे रंग,
तुम्हारी राहें
बना सकेंगे सेतु 
उन दूरियों को पाटने का 
जो बनायीं हैं इश्वर ने 
हम दोनों के बीच?
क्या रंगीन कर दोगे 
सपनों को मेरे 
जो कालिख में लिपटे 
दबे हुए हैं 
अंतर्मन की गहरी तहों में ?
क्या समेट कर
 बिखरे इन्द्रधनुष को मेरे
दोगे  ज़वाब इन फीके सवालों का .....?
इस होली पर.......

Sunday, 4 March 2012

होली में



कुछ बिखरे कुछ सिमटे होंगे 
रंग इस बरस होली में ,
चाहत राहत की आहट से 
दिल खिलने दो होली में .....
      लाल हरा या नीला पीला
      हुए एक जब लगे संग में ,
      रंग भंग की मस्ती छाई 
      उमंग लुटाओ होली में .....
जो बीती सो रीती बातें 
चाही -अनचाही सी धुन में 
अब तो घोलो रंग प्रेम का 
कडवी मीठी बोली में ......
       महके ऐसे रुत फागुन की 
       रंग अबीर के बादल में 
       कान्हा ने ज्यों रंग दी राधा 
       छेडछाड की रोली में ........
रोष मान के किस्से छोडो 
गले मिलो अमराई में 
रहे न कोई कडवाहट इस 
मस्ती हँसी ठिठोली में ........
कुछ बिखरे .......
रंग इस बरस ........

Saturday, 3 March 2012

उस रोज़



उस रोज़ से 
जब झील की एक लहर 
किनारे को तोड़ 
बहा ले गयी थी 
तुम्हारे पांवों की नमी ,
मैं आचमन कर रही हूँ 
हवा में घुले विकिरणों के अलावा 
प्रेम के वाष्प कणों का ---
पहाड़ों पर अपने  हस्ताक्षर करती
संवेदनाओं की गंध 
अब तक भी तुम तक 
पहुँचने में अटकती है ,
लेकिन -
न जाने क्यों 
तुम्हारे पांवों के निशान 
अब भी किनारे की रेत पर 
ताज़ा हैं ........... 

पुनर्जन्म



फिर निर्वासित हुई एक नारी 
अपने ही संबंधों की 
भीड़ में से 
अभिशप्त कटी बेल सी --
मुक्त कर दी गयी वह 
सभी संबोधनों,
विशेषणों,
क्रियायों और 
प्रतिक्रियाओं से .....
अब फिर से करेगी वह 
शून्य से शुरुआत 
तौल कर पर अपने 
उड़ेगी निर्बाध -
आसमान से ओस की तरह 
निरंतर बरसते संदेह 
और प्रताड़ना के बीच 
अड़ी रहेगी 
निडर,निष्कलंक .....
तब भी 
आस पास बसे 
वृक्षों का झुरमुट 
बार बार यही 
फुसफुसायेगा 
लो, 
फिर मुखर हो गया एक स्वर -
कोलाहल के जंगल में........