पंजों पे उचकते बच्चों की तरह
उजाले की खिड़की खोलने के प्रयास में
कई बार किनारे का तीखापन
महसूस ही नहीं होता ...
अँधेरे से दूर भागने की जिद
हवा का ज़हारीलापन भी
अनसुना कर देती है ......
और-
यहीं कहीं हो जाती है
दहलीजों को शिकायत .
तहजीब और तोहमतों के
बेमियादी सफ़र को
विराम लगाने की पहल
चलो मुझसे ही सही .....
कम से कम तुम्हारे इल्जामों में
यह एक तो आखिरी होगा .....!!!

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