किताब के पन्नों के
खुलने और बंद होने के बीच
फडफडIते हैं कई शब्द -
संप्रेषित होने की आस में
अनेकों बार छटपटाते हैं ,
गिनती रहती हूँ मैं उनका
यात्रांत की प्रतीक्षा में
बार बार शुरुआत तक जाना
उनकी भूख, मेरी प्यास से नहीं मिटती
कभी मिट कर ,कभी लिख कर ,
चुभन का निरंतर अहसास कराना
उन्हें खूब आता है ....
यही सब एक आदत सा
मेरे साथ साथ चलता है
रग-रग में बहता है ...
इसीलिए अपनी बिखरी हुई
कहानी समेट कर
अक्सर सोचती हूँ
काश ....
शब्दों की यह फडफडIहट
अनंत की ऊंचाइयों तक जाकर चीखे
और तब्दील हो सके
हमारे बीच पसरे
मौन की आवाज़ में .....

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