कल फिर रात देर तक
चाँद की उंगली थामे
पूरा चक्कर लगा आयी
छत से आसमान तक ....
सुबह होने पर एक एक तारे ने
बिना ऑंखें खोले ही भांप ली
मेरे सपनों की हकीकत और
बांध आये चाँद को सागर किनारे
लहरों की डोरी से ......
नदी किनारे के पत्थर सी
गोल गोल हुई जाती
सारे ज़माने की संवेदनाएं
सिमट कर चुपचाप
बैठ गयीं एक कोने में -
इंतजार में गिरह खुलने की ,
मगर लहरों की डोरी
और भी नमकीन होती गयी ....
आज निकली है
हवा से कानाफूसी करते
सितारों की जगमगाती रात -
कुछ नहीं बदला -
वही रौशनी, वही नज़ारा...
उधर संदेह को उलांघने की जिद में
चाँद घिर गया है
उलाहनों की कंटीली खरपतवार से -
मुक्ति -बंधन,असमंजस -निश्चय .....
क्या चाँद का फिर से टंगना
ज़रूरी है असमान में?????

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