तुम्हारे शहर से मुझ तक की दूरी
कम तो होगी
धरती से सूरज के बीच की दूरी से
परन्तु
आठ मिनिट से ज्यादा वक़्त
लग जाता है हमेशा
तुम्हारे भभकते हुए शब्दों की रौशनी को
मुझ तक पहुँचने में
और इसी बीच -
उग जाते हैं वे ज़हरीले पौधे
जिनके बीज भीगे थे
तुम्हारे संदेहों की बौछारों में
और बिंध गए थे गहरे
मेरे अंतर की उपजाऊ मिटटी में .....
अब -
उखाड़ नहीं पाती हूँ उन्हें जड़ से ,
जानती हूँ कालांतर में
इतना फ़ैल जायेगा यह जंगल
कि तुम्हारे अहसासों की आवाज़
गुम हो जाएगी यहाँ
और लौट जाएगी तुम तक
बार बार
प्रतिध्वनित होकर .........!
कम तो होगी
धरती से सूरज के बीच की दूरी से
परन्तु
आठ मिनिट से ज्यादा वक़्त
लग जाता है हमेशा
तुम्हारे भभकते हुए शब्दों की रौशनी को
मुझ तक पहुँचने में
और इसी बीच -
उग जाते हैं वे ज़हरीले पौधे
जिनके बीज भीगे थे
तुम्हारे संदेहों की बौछारों में
और बिंध गए थे गहरे
मेरे अंतर की उपजाऊ मिटटी में .....
अब -
उखाड़ नहीं पाती हूँ उन्हें जड़ से ,
जानती हूँ कालांतर में
इतना फ़ैल जायेगा यह जंगल
कि तुम्हारे अहसासों की आवाज़
गुम हो जाएगी यहाँ
और लौट जाएगी तुम तक
बार बार
प्रतिध्वनित होकर .........!

No comments:
Post a Comment