Tuesday, 13 March 2012

तुम्हारे शहर से

तुम्हारे शहर से मुझ तक की दूरी 
कम तो होगी 
धरती से सूरज के बीच की दूरी से 
परन्तु 
आठ मिनिट से ज्यादा वक़्त 
लग जाता है हमेशा 
तुम्हारे भभकते हुए शब्दों की रौशनी को 
मुझ तक पहुँचने में 
और इसी बीच -
उग जाते हैं वे ज़हरीले पौधे 
जिनके बीज भीगे थे 
तुम्हारे संदेहों की बौछारों में 
और बिंध गए थे गहरे 
मेरे अंतर की उपजाऊ मिटटी में .....
अब -
उखाड़ नहीं पाती हूँ उन्हें जड़ से ,
जानती हूँ कालांतर में 
इतना फ़ैल जायेगा यह जंगल
कि तुम्हारे अहसासों की आवाज़ 
गुम हो जाएगी यहाँ 
और लौट जाएगी तुम तक 
बार बार 
प्रतिध्वनित होकर .........!

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