तुम्हारी संवेदनाओं और
मेरी भावनाओं के
एकाकार होने के प्रयास में
तितर -बितर हो गए
वे सब रंग ,
जो समेटे थे इस होली के लिए -
रह गया सिर्फ
एक बिखरा हुआ इन्द्रधनुष .....
क्या तुम्हारे शब्द,
तुम्हारी चाहत ,
तुम्हारे रंग,
तुम्हारी राहें
बना सकेंगे सेतु
उन दूरियों को पाटने का
जो बनायीं हैं इश्वर ने
हम दोनों के बीच?
क्या रंगीन कर दोगे
सपनों को मेरे
जो कालिख में लिपटे
दबे हुए हैं
अंतर्मन की गहरी तहों में ?
क्या समेट कर
बिखरे इन्द्रधनुष को मेरे
दोगे ज़वाब इन फीके सवालों का .....?
इस होली पर.......

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