Monday, 24 February 2014

बहुत से रंग भाने लगे हैं
अब मैं सफ़ेद दुपट्टा नहीं ओढ़ती
सच है
जब मन बसंती हो तो
मौसम का कुछ भी कहना सुहाता है ....!
सुनो
आज मैं बहुत भीगी
भीतर से भी
बाहर से भी -
ज़रूर बादलों से मिल
साजिश रची होगी तुमने !
कुदरत के करामाती नज़ारों में
अनगढ़ शिला से ....
शिव हो तुम मेरी तीसरी दृष्टि में ,
बांध लो मुझे -
गंगा सा !!!!!

Saturday, 22 February 2014

 इंतज़ार ही तक़दीर है उस बंजर की ...फख्र जो हवा में उड़ते बादलों पे करे ......रेत में घुले चश्म ...भला बूंद बन कब बरसे हैं ...!!

Monday, 17 February 2014

आजकल दुआएं आसमान से नहीं बरसतीं
यूं ही रीता रीता सा रहता है
उम्मीदों का मन ,
और उपेक्षा की खुश्क हवाएँ
थपेड़े दिये जाती हैं ।
कहीं छिप के जलते हैं कुछ ख्वाब अधूरे 
यकीनन कागज़ में लिखे वादे
अब तक मिट कर
धुआँ धुआँ हो गए होंगे ....!!


Monday, 10 February 2014

न जाने मेरी कलम की स्याही से 
कोई और तस्वीर बनती ही नहीं .....
तमाम कागजों का जी 
यूँ ही रोज़ रोज़ जलता है ,,,,,,!!!!
कैसे जी लेते हो यूँ नीलकंठ बन के तुम ?
एक बार उगल दो ये सारा ज़हर .....
क्या हुआ जो बसंत नीला हो जायेगा !!!
और सुनो ,
मेरे लिए मौसमों की फेहरिस्त 
इतनी लम्बी नहीं-
पतझड़ के बाद कोई मौसम 
आता ही नहीं .......!
अब तो पलकों ने भी बगावत कर दी है .....
तुम मिलो तो कुछ कतरे टपकेंगे !!!

Sunday, 9 February 2014

 रेत के प्यालों में छुपा के रखती है वो 
अपने तमाम नम हुये ख्वाबों को ...
देखना एक रोज़ ...तुमसे मुलाक़ात का सूरज 
सोख लेगा प्यास की गठरी ...
और तब बिखर जाएगी 
दहलीज़ पर चाँदनी ही चाँदनी ......!!!!
निहायत सलीके से तहा  कर रखी तमाम शिकायतें
मनुहार के एक झोंके से
तितर बितर कर दीं तुमने -
लम्हा दर लम्हा फूलों का रंग नीला न पड़ जाये
ज़रा देखना …
ये बसंत अब…पीला न रहेगा !!!!