उलझे रेशम सी संवेदनाओं से संवाद करता मन ...कभी कभी तितली बन उड़ जाना चाहता है!!!
Monday, 17 February 2014
आजकल दुआएं आसमान से नहीं बरसतीं यूं ही रीता रीता सा रहता है उम्मीदों का मन , और उपेक्षा की खुश्क हवाएँ थपेड़े दिये जाती हैं । कहीं छिप के जलते हैं कुछ ख्वाब अधूरे यकीनन कागज़ में लिखे वादे अब तक मिट कर धुआँ धुआँ हो गए होंगे ....!!
No comments:
Post a Comment