कोकून
उलझे रेशम सी संवेदनाओं से संवाद करता मन ...कभी कभी तितली बन उड़ जाना चाहता है!!!
Saturday, 22 February 2014
इंतज़ार ही तक़दीर है उस बंजर की ...फख्र जो हवा में उड़ते बादलों पे करे ......रेत में घुले चश्म ...भला बूंद बन कब बरसे हैं ...!!
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