Saturday, 30 April 2011

एक ख्वाब पूरा होने को

चुप चुप से पलों में 
सांसों में समेट लेना 
हम जी जायेंगे बरसों की दूरी 
और नदी की रेत पर 
तुम्हारा नाम लिख कर पूछेंगे खुद से 
तुम इतने अच्छे क्यों हो?

Friday, 15 April 2011

मुट्ठियों में तुम

बहुत ढूँढने के बाद
मिल गए तुम मुझे 
अपनी हथेलियों के बीच 
मुश्किलों से टुकड़े टुकड़े जोड़ कर 
तुम्हारी तस्वीर बनाई
और फिर 
कस कर भींच लिया 
अपनी मुठ्ठियों को .....

Wednesday, 6 April 2011

बदल गयी थी न परिभाषा ?

बुनते ,उधेड़ते
उलझते ,सुलझते
बिखरते ,समेटते
यूँ ही गुजर जाता है
एक अहम् हिस्सा इस  जीवन का
और रख देते हो तुम प्रेम को
एक पुराने कोट के मानिंद
टांग कर अलमारी में
सबसे पीछे
कि जब कभी जरुरत होगी
तो निकाल लेंगे
मैं फिर भी
कास कर लपेट लेती हूँ
प्रेम कि उन बिखरी स्मृतियों  को
अपने चारों ओर
एक गरम शाल की तरह
और अब मुझे इन्तजार है उस पल का
जब शरद झोंकों से सिहरने पर
याद तो आएगा तुम्हे वो पुराना गरम कोट
पर जहमत न होगी तुमसे उससे निकलने की
तब
लपेट कर तुम्हे भी अपनी गरम शाल में
पूछूंगी ये प्रश्न
क्या प्रेम की परिभाषा 
बदल गयी थी?

Monday, 4 April 2011

अब तुम ही कहो ...

तुम्हे शायद मालूम नहीं
कि बहने से ज्यादा रिसने में
दर्द होता है
वर्ना तुम अपने अश्कों की
दुहाई नहीं देते
बल्कि गैरों के जख्मों पर
कोई सौगंध उठाते
बहना तो चांदनी है बादल है
सागर है
मगर रिसना ....



सूरज की आग /साँसों का ताप
धरती के अन्दर का लाल गरम लावा
सीने में दबी ख्वाहिश
हथेली पे खिंची कोई रेखा
होठों पर जलती मोमबत्ती है
अब तुम ही कहो
आँखों से झरती ओस की बूंदें
और होठों पर पिघल रही मोम में से
किसे पोंछ देना आसान है