Monday, 24 December 2012
चुप रहो क्यूंकि शब्द नश्तर हैं तुम्हारे
अब भी चुभन बह रही है नसों में .
आसमान का नीले से लाल हो जाना
जरूरी नहीं रोज़ की एक आदत हो ....
सुबह का अवसाद रातों रात पैदा नहीं होता
और चुप रहने से अकेलेपन की तौहीन हो
ये भी कतई जरूरी नहीं .....
कभी कभी सौ चुप्पियों को एक मामूली नज़र ही
तबाह कर देती है
तो कभी सैंकड़ों आवाज़ों का शोर भी
तमाम सन्नाटों पे पहरे नहीं लगा पाता ...
बेहतर है अपने जवाबों के दायरे में
खुद ही सवालों से सवाल करते रहो ....
तुम्हारा ये सिलसिला ख़त्म होते ही
मौन से हुए मेरे तमाम अनुबंध
खुद ब खुद टूट जायेंगे !!!!
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