Monday, 25 February 2013

अब कभी वजहों का ज़िक्र नहीं होगा ....


अब कभी वजहों का ज़िक्र नहीं होगा 
एक बिंदिया का रिश्ता ऐसा ही होता है .....
तुमने यादों की फेहरिस्त तह करके 
दबा दी होगी कहीं -
मुझे मालूम है 
अक्सर नए कागज़ पर ही 
कविता लिखते हो तुम।
फिर भी रेत  में तलाशूंगी 
तुम्हारी तमाम तहरीरें 
क्या हुआ जो उँगलियों के पोर 
धुआं धुआं हो जायेंगे ?
मैं नहीं जानती 
ज़ख्म क्या होते हैं ,कैसे रिसते  हैं ...?
तुम्हारी मुस्कराहटें 
अब तक मेरे साथ जो  थीं ...!
इतना मुश्किल भी न होगा तुम्हारे लिए 
मेरे बगैर उन राहों से गुजरना -
बस ...मुड़ कर देखने की ज़हमत न करना,
रेत पर बने लाल निशान 
तुम्हें भाएंगे नहीं .....
मेरी खामोश कविता 
तुमसे ज्यादा बातें करती है 
कोशिश करना ,
उसके चेहरे पर नज़र न पड़े तुम्हारी ...
चाँद सितारे सब वापस अपनी जगह टंग गए हैं 
और कविता का सूना माथा 
तुमसे कुछ कहेगा नहीं .....
एक बिंदिया का रिश्ता 
बस ऐसा ही होता है ....!!!!

Saturday, 16 February 2013

वज़ह...


सुनो ,
जीने की वज़ह तलाशने में 
उम्र के लम्हे बिखेरते रहने से बेहतर है 
राह चलते काँटों को 
चुन चुन कर 
अपने आंगन में सजा लेना -
बर्फ सी पिघलती रातों को याद करके 
वक़्त की गर्माहट को जाया मत करो 
क्यूंकि 
रिश्ते जब टपकने लगते हैं 
तो अहसास के तमाम कटोरे
लबालब हो जाते हैं ......
मेरी आदत में अब भी शुमार है
तुम्हारी आँखों में झाँक कर
बिंदिया सजाने का शगल -
अब तक अनगिनत सितारे
आसमान से उतर कर
मेरे आइने के कोने में झिलमिला रहे हैं ....
जानती हूँ कविता और अंकगणित का फर्क !
बगैर शब्दों के अपनी बात कहना
कविता नहीं , यात्रा है --
एक शहर में शाम को विदा किये बिना
अगली सुबह का इंतजार देकर चले जाना
तुम्हें तसल्ली देता है
और मुझे दिन गिनने की वज़ह --!
तभी तो अक्सर मेरी कविता में
गणित गड्ड -मड्ड हो जाता है ......
सुनो -
याद रखने के लिए ,
पतझड़ और बसंत ही काफी नहीं होते
पत्थरों के मसीहा अक्सर बेरंग होते हैं !
अबकी बार जीने की वज़ह तलाशने से पहले -
तमाम रंग बुन लेना अपने सपनों में
फिर देखना ,
प्यार का रंग सिर्फ महकता ही नहीं -
इन्सान को खुदा की सूरत के
बहुत नज़दीक पहुंचा देता है ,,,,,,,,!!!

Tuesday, 12 February 2013

चलो आज.....



चलो आज वक़्त के कानों में 
गुनगुना दें वो तराने 
जिनकी धुन में गुम हुई थी 
तुम्हारी आँखों की नमी 
और अब तक वो बरसात वहीँ थमी हुई है .....

चलो उन दरख्तों की  छाँव तले 
जिन्हें छू कर हवा का खिलखिलाना 
तुम्हारे होठों पे 
फूल उगा देता है 
और अब तक वो गुलशन अधबना पड़ा है .....

चलो आज फिर तलाश लें 
वो लम्हे इस बसंत में 
जो छुप कर तुम्हारी तोहमतों का 
असर जी  रहे हैं 
और दर्द यूँ ही पीले हुए जा रहे हैं ......

सुनो ! अब तुम्हारी हंसी का नमक 
बहा दो मौसम के संग ,
तमाम झीलों की जुबां 
खारी  न हो जाये तो कहना .......!!!

Sunday, 10 February 2013

तुम कभी थे ही नहीं ..

तमाम गर्द झाड़कर किताबों की 
आज फिर से निकाली है 
वो पीले पन्नों वाली डायरी 
जिसके आखिरी शब्दों में 
स्याही की महक अब भी ताज़ा है ....
धुंधले होते हर्फ़ 
ताउम्र साथ निभाने का 
दिलासा देते देते थक कर ,
उस नीली कमीज़ वाली तस्वीर के कोने में 
मुंह छिपाए पड़े हैं 
जिसकी सलवटों में तुम 
मेरे नाम के अर्थ ढूँढा करते थे .
सच कहूँ तो रोज़ कैलेन्डर देख कर 
दिन की शुरुआत करने की आदत 
मैंने बदल ली है .
सिर्फ एक ही तारिख के 
आगे -पीछे के दिनों का हिसाब लगाने में 
काफी वक़्त लग जाता है मुझे ......
कभी कभी सुबह की चाय की भाप में 
झील किनारे का वो मंदिर उभर आता है 
जहाँ से शाम की आरती की घंटियाँ 
पानी की सतह पर तैरती 
मुझ तक पहुँचती हैं ....
इन्सान और फरिश्तों में फर्क करने की 
तुम्हारी कोशिशें अब भी जारी हैं 
जबकि ज़माने ने उन्हें कभी भी 
एक समझा ही नहीं .
चांदनी और बरसात ने 
शहरों के बीच की दूरियां कब नापी हैं ?
उनका बरसना कभी भीड़ की नज़रों में 
बदलाव का कारण नहीं बना !
जानते हो 
यादों की पगड़डिया अक्सर फिसलन भरी होती हैं ?
मैं अब भी बार बार वहीँ देखती हूँ तुम्हें 
जहाँ तुम कभी थे ही नहीं ......!!!

प्रेम , तुम लौट आओ ...

सुनो प्रेम,तुम लौट आओ !
इन दिनों कुछ भी नहीं सुहाता 
न धूप ,न बादल ,न हवा ,न ही फूल 
तमाम रंग बदल गए हैं मौसम के ....!
चलो ,साथ चल के 
बादलों के माथे का पसीना पोंछेंगे 
जो हैरान हैं अचानक 
झील की हलचल थम जाने से !
उन हवाओं से भटकने की वज़ह पूछेंगे 
जिनकी राह में कितने ही भीगे आँचल 
टंग रहे हैं दालानों में !
आओ ,सवाल करेंगे बिखरते फूलों से 
कि लरजती खुशबुओं की फितरत 
कबसे बदल दी तुमने ?
सुनो प्रेम , 
तुम्हारे आने जाने से 
मौसम नहीं -मिज़ाज बदलते हैं ....
एक बार पलट कर देखो तो सही 
सब कुछ वहीँ का वहीँ थमा है 
बसंत के पांवों में पहिये लगाने के लिए ही सही 
प्रेम , तुम लौट आओ ......!!!

Sunday, 3 February 2013

लौट जाने दो मुझे













सूरज को अध् टंगा छोड़ 
ओस में नहाई सुबह के साथ 
लौट आई हूँ मैं 
तुम्हारी एक आवाज़ सुन कर ,
जबकि न जाने कितने
अधूरे काम बाकी हैं अभी ......!!
छत पर सुखाई तुम्हारी यादें 
यूँ ही पड़ी हैं 
परछाई की आड़ से झांकती दोपहर ने 
खूब नमी चुरा ली होगी ....!
बीते कल की पगडंडियों में
दो चार मील के पत्थर ही लगा पाई
अगली बार तुम्हारी चिट्ठियां
राह नहीं भटकेंगी ....!
उम्मीदों के धूल भरे कैक्टस
मुस्कराहट के फूल उगा ने ही वाले थे
क्यूंकि उलझनों के तमाम काँटे
मैंने बीन दिए थे ...!
यूँ अचानक न बुलाया करो मुझे -
उँगली थाम के राह दिखाने वाले
कितने ही खड़े हैं इंतजार में !
इससे पहले कि उनकी सोच के दायरे
सिमट कर
एक ही बिंदु से पहाड़ उगाने की कल्पना करें
लौट जाने दो मुझे
फिर से उसी गुमशुदा गली के
आखिरी मकान के अंधेरों में
जहाँ सूरज का पता खोजती हवाएं
अब भी ठिठकी सी खड़ी हैं .......!!!!