Sunday, 10 February 2013

तुम कभी थे ही नहीं ..

तमाम गर्द झाड़कर किताबों की 
आज फिर से निकाली है 
वो पीले पन्नों वाली डायरी 
जिसके आखिरी शब्दों में 
स्याही की महक अब भी ताज़ा है ....
धुंधले होते हर्फ़ 
ताउम्र साथ निभाने का 
दिलासा देते देते थक कर ,
उस नीली कमीज़ वाली तस्वीर के कोने में 
मुंह छिपाए पड़े हैं 
जिसकी सलवटों में तुम 
मेरे नाम के अर्थ ढूँढा करते थे .
सच कहूँ तो रोज़ कैलेन्डर देख कर 
दिन की शुरुआत करने की आदत 
मैंने बदल ली है .
सिर्फ एक ही तारिख के 
आगे -पीछे के दिनों का हिसाब लगाने में 
काफी वक़्त लग जाता है मुझे ......
कभी कभी सुबह की चाय की भाप में 
झील किनारे का वो मंदिर उभर आता है 
जहाँ से शाम की आरती की घंटियाँ 
पानी की सतह पर तैरती 
मुझ तक पहुँचती हैं ....
इन्सान और फरिश्तों में फर्क करने की 
तुम्हारी कोशिशें अब भी जारी हैं 
जबकि ज़माने ने उन्हें कभी भी 
एक समझा ही नहीं .
चांदनी और बरसात ने 
शहरों के बीच की दूरियां कब नापी हैं ?
उनका बरसना कभी भीड़ की नज़रों में 
बदलाव का कारण नहीं बना !
जानते हो 
यादों की पगड़डिया अक्सर फिसलन भरी होती हैं ?
मैं अब भी बार बार वहीँ देखती हूँ तुम्हें 
जहाँ तुम कभी थे ही नहीं ......!!!

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