Saturday, 16 February 2013

वज़ह...


सुनो ,
जीने की वज़ह तलाशने में 
उम्र के लम्हे बिखेरते रहने से बेहतर है 
राह चलते काँटों को 
चुन चुन कर 
अपने आंगन में सजा लेना -
बर्फ सी पिघलती रातों को याद करके 
वक़्त की गर्माहट को जाया मत करो 
क्यूंकि 
रिश्ते जब टपकने लगते हैं 
तो अहसास के तमाम कटोरे
लबालब हो जाते हैं ......
मेरी आदत में अब भी शुमार है
तुम्हारी आँखों में झाँक कर
बिंदिया सजाने का शगल -
अब तक अनगिनत सितारे
आसमान से उतर कर
मेरे आइने के कोने में झिलमिला रहे हैं ....
जानती हूँ कविता और अंकगणित का फर्क !
बगैर शब्दों के अपनी बात कहना
कविता नहीं , यात्रा है --
एक शहर में शाम को विदा किये बिना
अगली सुबह का इंतजार देकर चले जाना
तुम्हें तसल्ली देता है
और मुझे दिन गिनने की वज़ह --!
तभी तो अक्सर मेरी कविता में
गणित गड्ड -मड्ड हो जाता है ......
सुनो -
याद रखने के लिए ,
पतझड़ और बसंत ही काफी नहीं होते
पत्थरों के मसीहा अक्सर बेरंग होते हैं !
अबकी बार जीने की वज़ह तलाशने से पहले -
तमाम रंग बुन लेना अपने सपनों में
फिर देखना ,
प्यार का रंग सिर्फ महकता ही नहीं -
इन्सान को खुदा की सूरत के
बहुत नज़दीक पहुंचा देता है ,,,,,,,,!!!

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