Tuesday, 12 February 2013

चलो आज.....



चलो आज वक़्त के कानों में 
गुनगुना दें वो तराने 
जिनकी धुन में गुम हुई थी 
तुम्हारी आँखों की नमी 
और अब तक वो बरसात वहीँ थमी हुई है .....

चलो उन दरख्तों की  छाँव तले 
जिन्हें छू कर हवा का खिलखिलाना 
तुम्हारे होठों पे 
फूल उगा देता है 
और अब तक वो गुलशन अधबना पड़ा है .....

चलो आज फिर तलाश लें 
वो लम्हे इस बसंत में 
जो छुप कर तुम्हारी तोहमतों का 
असर जी  रहे हैं 
और दर्द यूँ ही पीले हुए जा रहे हैं ......

सुनो ! अब तुम्हारी हंसी का नमक 
बहा दो मौसम के संग ,
तमाम झीलों की जुबां 
खारी  न हो जाये तो कहना .......!!!

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