Sunday, 3 February 2013

लौट जाने दो मुझे













सूरज को अध् टंगा छोड़ 
ओस में नहाई सुबह के साथ 
लौट आई हूँ मैं 
तुम्हारी एक आवाज़ सुन कर ,
जबकि न जाने कितने
अधूरे काम बाकी हैं अभी ......!!
छत पर सुखाई तुम्हारी यादें 
यूँ ही पड़ी हैं 
परछाई की आड़ से झांकती दोपहर ने 
खूब नमी चुरा ली होगी ....!
बीते कल की पगडंडियों में
दो चार मील के पत्थर ही लगा पाई
अगली बार तुम्हारी चिट्ठियां
राह नहीं भटकेंगी ....!
उम्मीदों के धूल भरे कैक्टस
मुस्कराहट के फूल उगा ने ही वाले थे
क्यूंकि उलझनों के तमाम काँटे
मैंने बीन दिए थे ...!
यूँ अचानक न बुलाया करो मुझे -
उँगली थाम के राह दिखाने वाले
कितने ही खड़े हैं इंतजार में !
इससे पहले कि उनकी सोच के दायरे
सिमट कर
एक ही बिंदु से पहाड़ उगाने की कल्पना करें
लौट जाने दो मुझे
फिर से उसी गुमशुदा गली के
आखिरी मकान के अंधेरों में
जहाँ सूरज का पता खोजती हवाएं
अब भी ठिठकी सी खड़ी हैं .......!!!!

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